डिजिटल युग में ‘सबसे पहले’ सूचना देने की होड़ और सोशल मीडिया पर बिना सत्यापन (Fact-check) के दस्तावेज साझा करने की जल्दबाजी एक बार फिर एक नामचीन पत्रकार के लिए गले की हड्डी बन गई है। इंडिया टीवी की एंकर मीनाक्षी जोशी द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) पर साझा किए गए एक कथित मेडिकल दस्तावेज को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यूजर्स द्वारा दस्तावेज की प्रामाणिकता और उसमें दर्ज तारीख पर सवाल उठाए जाने के बाद एंकर को अपनी पोस्ट डिलीट करनी पड़ी। इस घटना ने एक बार फिर मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया पर पत्रकारिता के गिरते स्तर और फैक्ट-चेकिंग की अनिवार्यता पर नई बहस छेड़ दी है।

क्या है पूरा मामला?
मामले की शुरुआत लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और उसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराए जाने के घटनाक्रम से हुई। आरोप है कि इसके बाद बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय सहित कई ट्रोल्स और कुछ पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर एक कथित मेडिकल रिपोर्ट और सहमति पत्र (Consent Form) साझा करना शुरू कर दिया। इस पोस्ट के जरिए यह नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही थी कि सोनम वांगचुक ने स्वयं अपनी मर्जी से मेडिकल जांच की सहमति दी है।

इंडिया टीवी की एंकर मीनाक्षी जोशी ने भी इसी तरह की एक पोस्ट अपने आधिकारिक अकाउंट से साझा की। हालांकि, पोस्ट होते ही जागरूक सोशल मीडिया यूजर्स ने दस्तावेज में एक बड़ी गड़बड़ी पकड़ ली।
तारीखों के फेर में फंसा नैरेटिव
यूजर्स ने रेखांकित किया कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और अस्पताल में भर्ती होने की घटना 18 जुलाई तड़के की है, जबकि उनके नाम से साझा किए गए कथित मेडिकल कंसेंट फॉर्म पर 13 जुलाई की तारीख दर्ज थी। घटना से 5 दिन पहले की तारीख वाले इस दस्तावेज ने तुरंत इसकी प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इसके अलावा, कई यूजर्स ने यह भी दावा किया कि दस्तावेज पर की गई हैंडराइटिंग सोनम वांगचुक की नहीं है।
जैसे ही यूजर्स ने तारीखों के इस विरोधाभास को लेकर एंकर को ट्रोल करना और सवाल पूछना शुरू किया, मीनाक्षी जोशी ने बिना कोई स्पष्टीकरण दिए अपनी पोस्ट डिलीट कर दी। हालांकि, तब तक यूजर्स उनके ट्वीट के स्क्रीनशॉट ले चुके थे, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हैं।
’कॉपी-पेस्ट’ पत्रकारिता पर उठे सवाल
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। आलोचकों और स्वतंत्र पत्रकारों का कहना है कि यह घटना दर्शाती है कि कैसे कुछ पत्रकार बिना सोचे-समझे और बिना किसी बुनियादी जांच के किसी राजनीतिक दल या आईटी सेल द्वारा भेजे गए कंटेंट को हूबहू (कॉपी-पेस्ट) पोस्ट कर देते हैं।
यूजर्स का कहना है कि एक नेशनल न्यूज चैनल की एंकर से यह उम्मीद की जाती है कि वह कम से कम दस्तावेज में लिखी तारीख जैसी बुनियादी चीजों की जांच तो जरूर करेंगी। इस जल्दबाजी को लेकर सोशल मीडिया पर तंज भी कसे जा रहे हैं कि “जो ऊपर से आया, वही आगे ठेल दिया गया।”
डिजिटल युग में फैक्ट-चेकिंग की जरूरत
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में दर्शक और सोशल मीडिया यूजर्स बेहद सतर्क हैं। वे किसी भी नैरेटिव या दस्तावेज को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करते। पत्रकारों के लिए यह घटना एक सबक की तरह है कि डिजिटल स्पेस में विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ‘स्पीड’ से ज्यादा ‘सत्यता और सत्यापन’ जरूरी है, अन्यथा एक छोटी सी चूक भी पूरी साख पर सवालिया निशान लगा सकती है।





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