अभिषेक उपाध्याय (वरिष्ठ पत्रकार) नोएडा
प्रमुख बिंदु (Key Highlights):
- इथेनॉल पर मुखरता पड़ी भारी: इथेनॉल नीति के खिलाफ वीडियो बनाने और 15 जुलाई के संभावित विरोध प्रदर्शन की चर्चा करने पर एक दर्जन एंकर्स को किया गया था ‘ऑफ एयर’।
- इंस्टाग्राम अकाउंट डिलीट करने का था दबाव: चैनल प्रबंधन ने एंकर से उसका सोशल मीडिया अकाउंट हटाने की शर्त रखी थी।
- शर्त ठुकराकर छोड़ा संस्थान: कॉरपोरेट दबाव के आगे झुकने के बजाय एंकर ने नौकरी से इस्तीफा देना बेहतर समझा।
- जंतर-मंतर से डिजिटल कवरेज: गुलामी की बेड़ियों को तोड़ते हुए एंकर ने अब अपनी शर्तों पर स्वतंत्र और जमीनी पत्रकारिता की राह चुन ली है।
विस्तृत समाचार:
भारतीय मीडिया जगत में मुख्यधारा के चैनलों की कार्यशैली, कॉरपोरेट दबाव और डिजिटल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छिड़ गई है। हाल ही में सामने आए एक घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि तमाम बंदिशों के बावजूद कुछ पत्रकार अपनी वैचारिक स्वतंत्रता से समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, देश में इथेनॉल (Ethanol) से जुड़ी नीतियों और उसके प्रभावों को लेकर मुखरता दिखाने वाले लगभग एक दर्जन एंकर्स को चैनलों द्वारा अचानक ‘ऑफ एयर’ (स्क्रीन से बाहर) कर दिया गया था। इन पत्रकारों का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इथेनॉल के विरोध में वीडियो बनाए थे और आगामी 15 जुलाई को होने वाले विरोध प्रदर्शन की आशंकाओं व जमीनी हालातों पर खुलकर बात की थी।
चैनल की शर्त: या तो अकाउंट डिलीट करो या…
मुख्यधारा के मीडिया घरानों पर अक्सर सत्ता और कॉरपोरेट घरानों के दबाव में काम करने के आरोप लगते रहे हैं। इसी क्रम में, जब इन एंकर्स पर नकेल कसने की कोशिश की गई, तो एक प्रमुख एंकर को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया। चैनल प्रबंधन ने उनके सामने शर्त रखी कि वे तुरंत अपना वह इंस्टाग्राम अकाउंट डिलीट करें, जिसके जरिए इथेनॉल के खिलाफ वीडियो साझा किए गए थे।
चैनल की इस तानाशाहीपूर्ण शर्त ने पत्रकार के अंतरात्मा को झकझोर दिया। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी आवाज को दबाए जाने के बजाय, एंकर ने चैनल की नौकरी को ही अलविदा कहने का साहसिक फैसला किया। इस तरह उन्होंने चैनल के दबाव को सिरे से खारिज कर दिया।
जंतर-मंतर से शुरू हुई ‘आज़ादी की नई राह’
नौकरी छोड़ने के बाद इस एंकर ने पारंपरिक स्टूडियो की चारदीवारी से बाहर निकलकर सीधे जंतर-मंतर का रुख किया है। मुख्यधारा की मीडिया से नाता टूटने के बाद अब उन्होंने अपने व्यक्तिगत सोशल मीडिया हैंडल्स के जरिए जनता के बीच जाकर स्वतंत्र और निष्पक्ष कवरेज की भाषा चुन ली है।
मीडिया गलियारों में इस घटना को एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है। इसे कॉरपोरेट मीडिया की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता की एक नई और बुलंद शुरुआत के रूप में सराहा जा रहा है।





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