
लखनऊ। सहारा इंडिया ग्रुप द्वारा अपने हजारों कर्मचारियों के वेतन से भविष्य निधि (पीएफ) की कटौती करने के बावजूद उसे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में जमा न कराने के मामले में अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। करीब तीन महीने की गहन सुनवाई के बाद लखनऊ कोर्ट ने पुलिस की सुस्त और गैर-जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए लखनऊ पुलिस को सहारा ग्रुप के पीएफ ट्रस्टियों के खिलाफ प्रासंगिक और गंभीर धाराओं में तत्काल एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है।
10 साल का पीएफ बकाया, 1200 करोड़ से अधिक की राशि गायब
मामले के अनुसार, सहारा ग्रुप की विभिन्न कंपनियों में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन से पीएफ की राशि हर महीने नियमित रूप से काटी जाती रही, लेकिन इसे क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त कार्यालय, लखनऊ में जमा नहीं किया गया। कर्मचारियों की शिकायतों पर जब ईपीएफओ ने जांच शुरू की और दबाव बनाया, तब कंपनी ने महज 14 महीने का पीएफ जमा कराया। हालांकि, कर्मचारियों के वेतन से काटी गई लगभग 10 वर्षों की पीएफ राशि अब भी बकाया है, जिसका अनुमानित आंकड़ा 1200 करोड़ रुपये से भी अधिक बताया जा रहा है।
पुलिस और नौकरशाही की भूमिका पर उठे सवाल
कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त अश्वनी कुमार ने तत्कालीन पुलिस कमिश्नर से भी मुलाकात की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस दौरान यह बात भी सामने आई कि उत्तर प्रदेश शासन के पंचम तल पर तैनात एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एफआईआर दर्ज कराने के पक्ष में नहीं थे। प्रशासनिक और पुलिसिया ढिलाई से क्षुब्ध होकर ईपीएफओ आयुक्त को अंततः न्याय के लिए अदालत का रुख करना पड़ा।
अगले 2-4 दिनों में हो सकती है बड़ी कार्रवाई
अदालत के सख्त आदेश के बाद अब पुलिस महकमे में खलबली मच गई है। माना जा रहा है कि अगले दो से चार दिनों के भीतर सहारा ग्रुप के पीएफ ट्रस्टियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया जाएगा। एफआईआर के बाद जांच एजेंसियां इस बात की तफ्तीश करेंगी कि कर्मचारियों के गाढ़ी कमाई के 1200 करोड़ रुपये कहां इस्तेमाल किए गए और इसके लिए मुख्य रूप से कौन-कौन से अधिकारी व ट्रस्टी जिम्मेदार हैं।





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