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वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय की दलीलों पर पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सभी FIR में गिरफ्तारी पर रोक

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज FIR के मामले में वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को बड़ी राहत दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने याचिका पर सुनवाई करते हुए पत्रकार के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई और संभावित गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है।

​अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अंतरिम सुरक्षा न केवल गाजियाबाद में दर्ज मौजूदा FIR पर लागू होगी, बल्कि यदि उत्तर प्रदेश में उनके खिलाफ भविष्य में कोई अन्य FIR दर्ज की जाती है, तो उस पर भी यह आदेश प्रभावी रहेगा।

FIR की प्रति सौंपने का निर्देश

​सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया कि अभिषेक उपाध्याय को संबंधित FIR की पूरी प्रति अविलंब उपलब्ध कराई जाए। पीठ ने गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त को आदेश जारी किया कि वह अगली सुनवाई तक अदालत के समक्ष FIR की कॉपी दिए जाने के संबंध में अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) दाखिल करें। इस मामले पर अगली सुनवाई 7 सितंबर को तय की गई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने रखीं मजबूत दलीलें

​अदालत में अभिषेक उपाध्याय का पक्ष रखते हुए सुप्रीम कोर्ट बार काउंसिल के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को निष्पक्ष और खोजी पत्रकारिता के कारण निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता ने अयोध्या में राम मंदिर से जुड़ी कथित अनियमितताओं और विभिन्न सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार से जुड़ी प्रमुख रिपोर्ट प्रकाशित की थीं।

​वरिष्ठ अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR पूरी तरह झूठी और मनगढ़ंत है तथा पत्रकार को केवल प्रताड़ित करने के उद्देश्य से यह कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने जांच निष्पक्ष बनाए रखने के लिए मामले को उत्तर प्रदेश पुलिस के बजाय किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी (जैसे CBI) को सौंपने की मांग की।

CCTV फुटेज सुरक्षित रखने की मांग

​मामला गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में 18 अगस्त को दर्ज एक FIR से जुड़ा है। आरोप के अनुसार, शिप्रा मॉल के पास एक कार और मोटरसाइकिल की कथित टक्कर और विवाद के बाद पत्रकार का नाम मामले में सामने आया।

​अभिषेक उपाध्याय ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने बताया कि उस समय वे अपनी बेटी को स्कूल से लेकर लौट रहे थे और वहां कोई हाथापाई या दुर्घटना नहीं हुई थी। याचिका में यह भी दावा किया गया कि FIR में उल्लिखित मोटरसाइकिल का नंबर भी गलत दर्ज किया गया है।

​सीनियर एडवोकेट प्रदीप राय ने अदालत से अनुरोध किया कि घटना के समय की सच्चाई सामने लाने के लिए घटनास्थल के आसपास की दुकानें और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश दिए जाएं, क्योंकि पुलिस दुकानदारों पर फुटेज हटाने या न देने का दबाव बना रही है। इसके अलावा, 20 अगस्त की रात पुलिसकर्मियों द्वारा उनके घर पहुंचने की घटना के बाद गिरफ्तारी की आशंका जताई गई थी।

हाईकोर्ट जाने का परामर्श

​सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बार-बार FIR दर्ज होने की स्थिति में याचिकाकर्ता की आशंकाएं स्वाभाविक हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत FIR रद्द कराने (Quashing) के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख करना चाहिए।

​अदालत ने कहा:

“बार-बार FIR दर्ज होने से आपकी आशंका को हम समझते हैं। हमें सच्चाई का पता नहीं है, लेकिन आपकी आशंका समझ में आती है। आप हाईकोर्ट जाइए और अगर मामला बनता है तो FIR रद्द कराने की मांग कर सकते हैं। तब तक हम आपको अंतरिम सुरक्षा दे सकते हैं।”

 

​सुप्रीम कोर्ट द्वारा गाजियाबाद FIR की प्रति उपलब्ध कराने का मुख्य उद्देश्य भी यही है कि याचिकाकर्ता पूर्ण कानूनी दस्तावेजों के साथ राहत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकें।

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Author: media4samachar

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