नई दिल्ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर ‘Editors Club Of India’ नामक पेज द्वारा जारी किए गए एक पोस्ट को लेकर मीडिया जगत में नया विवाद खड़ा हो गया है। उक्त संस्था ने एक रंगीन बैनर पोस्ट के जरिए अपील की थी— “सभी संपादको से विशेष आग्रह है 0980____ पर अपने पूर्ण परिचय के साथ मैसेज करें…”। यही नहीं अगर मेंबर बनना हैं तो उसके लिए पहले 2100 दक्षिणा देना होगा तब जाकर आप एडिटर्स क्लब ऑफ इंडिया के मेंबर बन सकते हैं
इस पोस्ट के सामने आते ही वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों ने इसकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
सहारा जैसे देश के शीर्ष मीडिया समूहों में लंबे समय तक वरिष्ठ पदों और संपादक के रूप में सेवाएं दे चुके अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार व नेशन 27 न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर पत्रकार देवकीनंदन मिश्रा ने इस पोस्ट पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एक विस्तृत लेख लिखा है।
”फेसबुक पर नंबर जारी कर बायोडाटा मांगना संपादकों का अपमान”
देवकीनंदन मिश्रा ने कहा कि अपने 33 वर्षों के दीर्घकालिक पत्रकारिता करियर में उन्होंने कभी नहीं सुना कि पत्रकारों या संपादकों की कोई संस्था उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए इस तरह सोशल मीडिया पर अभियान चलाकर निजी विवरण और परिचय मांग रही हो। उन्होंने इस प्रक्रिया को पेशेवर मर्यादा और संपादकों की गरिमा के पूरी तरह खिलाफ बताया।
’जेबी’ संगठनों और उनकी कार्यशैली पर बड़ा प्रहार
अपने लेख में देवकीनंदन मिश्रा ने ऐसे संगठनों को आड़े हाथों लेते हुए कई गंभीर बिंदु उठाए:
- जेबी संस्थाएं (Pocket Organizations): देश में ऐसे सैकड़ों पत्रकार संगठन सक्रिय हैं जो केवल किसी खास व्यक्ति, नेता या एजेंडे की जेब में रहते हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें बाहर निकाला जाता है और काम पूरा होते ही वापस बंद कर दिया जाता है।
- संस्थापकों की नीयत पर सवाल: इस तरह के संगठनों को शुरू करने वाले अक्सर टीवी शो में गैर-जिम्मेदाराना बयानबाज़ी करने वाले चेहरे होते हैं। इन संस्थाओं में शामिल अधिकांश लोगों का वास्तविक और निष्पक्ष पत्रकारिता से न तो कोई संबंध रहा है और न ही आगे होने की संभावना है।
- पत्रकारों का नुकसान: ऐसी संस्थाएं अपनी व्यावसायिक और व्यक्तिगत दुकानें चला लेती हैं, लेकिन इनका सबसे बड़ा नुकसान उन निष्पक्ष पत्रकारों को उठाना पड़ता है जो धरातल पर काम कर रहे हैं।
”हर माध्यम का कार्यकर्ता मूलतः पत्रकार है”
मिश्रा ने जोर देकर कहा कि प्रिंट, टीवी या डिजिटल—किसी भी माध्यम में कार्य करने वाला हर व्यक्ति मूल रूप से पत्रकार ही है। संस्थाओं द्वारा संपादकों और रिपोर्टरों के नाम पर किया जाने वाला कृत्रिम विभाजन और इस तरह खुलेआम व्हाट्सएप/मैसेज के जरिए बायोडाटा मांगना मीडिया जगत के मानकों को गिराने जैसा है।
देवकीनंदन मिश्रा का यह लेख वर्तमान समय में कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे तथाकथित पत्रकार संगठनों और मीडिया के नाम पर चल रही गतिविधियों पर एक गंभीर और तीखा प्रहार प्रस्तुत करता है।


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