Media4samachar पर प्रकाशित मुस्लिम पत्रकारों को हटाने जाने की खबर पर NDTV ने अपना स्पष्टीकरण भेजा हैं,पढ़िए
एनडीटीवी पर एफ़तरफ़ा आरोप लगाने वाले एक स्थानीय पत्रकार ने सिर्फ़ वो लिखा, जो वो लिखवाना चाहते थे। आपको ख़बर भेजने वाले ने शायद ये नहीं बताया होगा कि गोरखपुर के ही रहने वाले एनडीटीवी के ब्यूरो चीफ रणवीर ने मुख्यमंत्री के शहर में अबरार अहमद को विनीत पांडेय के चैनल से इस्तीफ़े के बाद नियुक्त किया गया। श्रावस्ती में अम्मार रिज़वी को रखा गया। अमरोहा में अफ़सर अली, मुरादाबाद में कुछ दिन पहले मिर्ज़ा ग़ालिब, औरैया में ज़ाहिद अली की भी नियुक्ति ब्यूरो हेड रणवीर की जॉइनिंग के बाद हुई।
अब अगर बात करें पहले से काम करने वाले मुस्लिम स्थानीय संवाददाताओं की तो अलीगढ़ में अदनान ख़ान, बहराइच में सलीम सिद्धकी, बलरामपुर में मोहम्मद सलीम, बाराबंकी में सरफ़राज़ वारसी, बस्ती में मज़हर आज़ाद, बिजनौर में ज़ुबैर ख़ान, बुलंदशहर में समीर अली, हापुड़ के अदनान ख़ान, हरदोई में मोहम्मद आसिफ़, कन्नौज में इसराइल ख़ान, कासगंज में फ़हीम अख़्तर, कौशांबी में मोहम्मद बाकर, महोबा में इरफ़ान पठान, रायबरेली में फ़ैज़ अब्बास, रामपुर में तमकीन फ़ैयाज़, सिद्धार्थनगर में सलमान आमिर और सीतापुर में मोहम्मद समीर पहले से एनडीटीवी में संवाददाता के तौर पर काम कर रहे हैं।
एनडीटीवी किसी संवाददाता की नियुक्ति उसके जाति और धर्म के आधार पर नहीं करता। संस्थान में ख़बरों में सक्रियता उसकी नियुक्ति का आधार होती है। जिन लोगों पर कार्रवाई की गई है, उन्हें एक साल से ज़्यादा का मौक़ा ख़ुद को साबित करने के लिए दिया गया। एक दो नहीं बल्कि हर बड़ी ख़बर में लापरवाही को देखते हुए कई कई बार उन्हें मौके दिए गए लेकिन वो साबित नहीं कर सके। अगर मुस्लिम होना किसी पर कार्रवाई होता तो वर्तमान में जो मुस्लिम वर्ग से आने वाले संवाददाता हैं, उनपर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
रही बात स्वर्गीय कमाल ख़ान साहब की तो कमाल साहब एनडीटीवी के लिए हमेशा से आदरणीय रहे हैं। उनका जाना एनडीटीवी के लिए और यूपी की पत्रकारिता के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शायद यही वजह है कि एनडीटीवी यूपी के ह्वाट्सऐप ग्रुप में कमाल साहब का नंबर आज भी जुड़ा है।
सोचिए, आगरा में करणी सेना बुलडोज़र लेकर सांसद के घर पहुंचकर तोड़फोड़ कर रही है और घटना के तीन घंटे बाद भी नसीम अहमद को ख़बर का पता नहीं है। ऐसे कई घटनाएँ हैं, जहां हम मिनटों में नहीं, घंटों में पिछड़े रहे। क्या कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?
अरशद जमाल हमेशा ये कहते रहे कि कहीं ख़बर दिखे तो कॉल करके उन्हें बताया जाये तो वो एक दो घंटे के भीतर मैनेज करके ख़बर भेजेंगे। कोई चैनल ये एप्रोच स्वीकार कर पाएगा?
हमीरपुर के सलाउद्दीन जी 78 साल के थे। उन्होंने कहा कि उनके बेटे कि शादी अगले दो तीन महीनों में है, इसलिए उन्हें तीन महीने का समय दिया जाये। हमने छह महीने का समय दिया। चित्रकूट वाले भी घंटों तक ख़बरों को पता ही करते रहते थे।
अलीगढ़ वाले भी लापरवाही कर रहे थे, लेकिन वार्निंग देने के बाद वो सक्रिय हो गए तो उन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? वो भी तो मुस्लिम हैं। बस्ती में मज़हर आज़ाद और कानपुर में अरुण श्रीवास्तव की उम्र 70 साल से ज़्यादा है। काम की वजह से उन्हें अब तक रिटायर नहीं किया गया।
बुलंदशहर में समीर अली कैंसर से पीड़ित हैं। बोल नहीं पा रहे। बावजूद उन्हें हटाने की कोई कार्रवाई नहीं हुई। हमने हमेशा समीर अली को कहा कि सेहत का ध्यान दीजिए, ख़बरों को हम मैनेज कर लेंगे। आप चाहें तो उनसे पूछ सकते हैं।
तो ये तय है मुस्लिम पत्रकारों के एनडीटीवी से सफ़ाये की खबर मनगढ़ंत और निराधार है!





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