अभिषेक उपाध्याय (वरिष्ठ पत्रकार)
यूपी की पत्रकारिता की एक बड़ी बुआ हैं।
झा साहब।
बड़ी बुआ इसलिए क्योंकि इनकी पूरी पत्रकारिता ही-
“उस नेता ने फोन पर किससे क्या कहा।”
“उसने खाना खाने के बाद कितनी बार डकार ली।”
“उसने सोते समय कितने मिनट खर्राटे लिए।”
“उस नेता ने आज फ्रेश होने में कुल कितना वक्त लिया। ”
जैसी चंडूखाने की सुपर मार्केट में बिक रही अफवाहों की नई नई सब्जियों पर आधारित रहती हैं।
बुआ बाहुबलियों की सबसे बड़ी सलाहकार हैं और अपनी उलूल-जुलूल सलाहों से उनके भविष्य का पर्चा फाड़ती रहती हैं।
हाल ही में इन्होंने सवालों के घेरे में घिरे एक बाहुबली को इंटरव्यू देने की सलाह दे डाली।
बाहुबली के लिए ये शांत रहने का सबसे मुफीद समय था,
क्योंकि किसी भी एजेंसी, किसी भी सरकार या फिर उनके किसी भी विरोधी ने उनका नाम लेकर कोई आरोप लगाया ही नहीं था।
हकीकत भी यही थी कि उनका नाम परिस्थितजन्य साक्ष्यों में सामने आ रहा था।
कोई डायरेक्ट साक्ष्य अभी तक सामने नहीं आया था।
इसके बावजूद यूपी की पत्रकारिता की बड़ी बुआ ने उन्हें इंटरव्यू देने की सलाह देकर बेवजह ही सारा फोकस उन पर केंद्रित करवा दिया।
बड़ी बुआ इससे पहले भी पारिवारिक मामलों में घिरे एक बाहुबली को पत्रकार पर एफआईआर कराने की सलाह देकर उनकी भारी किरकिरी करा चुकी हैं।
उस केस में भी मामला पारिवारिक था। केस कोर्ट में था।
कोर्ट में गए हर केस की रिपोर्टिंग होती है। इसकी भी होनी ही थी। शुरूआत कोई भी करता।
वही हुआ भी।
आज तक उन बाहुबली का केस चप्पे चप्पे पर छाया हुआ है, क्योंकि इसमें किसी बाहरी का कोई रोल न था और न हो सकता था।
मगर बुआ वहां भी एक्टिव थीं और सब गुड़गोबर करके मानी।
बुआ इन दिनो इसलिए भी बेहद चर्चा में हैं क्योंकि उन्होंने अपनी कलम को ही कोडीन की कफ सिरप पिलाकर सुला दिया है।
हर मामले में तीन-पांच करने वाली बुआ कोडीन कफ सिरप के मामले में रहस्यमय ढंग से खामोश हैं।
वे भगौने से चुपचाप दूध पीकर भागने वाली बिल्ली की तरह इस मामले से नौ-दो-ग्यारह हो चुकी हैं,
क्योंकि बाहुबली उनके अच्छे दोस्त हैं।
बुआ जब से पुराने समूह से ‘जबरन’ विदा की गई हैं और नए समूह में आई हैं,
उन्होंने अपनी वही पुरानी तीन-पांच वाली तिया-पांचा टाइप पत्रकारिता से अपने नए समूह की ‘टॉप’ पत्रकारिता को ही ‘लल्लन’ बना दिया है।
ऐसा होगा नहीं, बावजूद लग तो यही रहा है जैसे बुआ ने पूरे समूह को कोडीन मामले में खामोश रहने की कोई डील करा दी हो।
बुआ कुछ भी कर सकती हैं।
वे अपनी इसी तीन-पांच टाइप पत्रकारिता के चलते आज़म ख़ान की बेगम की बहन जी से मुलाकात भी करा चुकी हैं।
बड़ी बात ये भी रही कि इस मुलाकात की ख़बर सबको लगी, सिवाए बहन जी के।
मुझे लगता है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के विभागाध्यक्ष और संघ के स्वयंसेवक सौरभ मालवीय को बुआ को ससम्मान विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में आमंत्रित करना चाहिए-
और ‘पत्रकारिता के बुआकरण’ विषय पर उनका एक भाषण आयोजित करना चाहिए।
पत्रकारिता के नए छात्र अगर इस विधा को नहीं समझेंगे,
तो जैसे प्रयोग में न होने के चलते पालि और प्राकृत सरीखी भाषाएं विलुप्त हो गईं, वैसे ही एक रोज़ ये ‘बुआ’ पत्रकारिता भी विलुप्त हो जाएगी।
और ये तीन-पांच टाइप पत्रकारिता की अपूर्णीय क्षति होगी!!





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