किसी बड़े खेल का हिस्सा है अर्नब का तमाशा। ह्रदय होते हैं तो परिवर्तित होते हैं, वह एक हृदयहीन शातिर खिलाड़ी है मीडिया बिजनेस का। – अशोक कुमार पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार
रिपब्लिक टीवी के मालिक और एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी की पत्रकारिता को देख न सिर्फ जनता बल्कि खुद पत्रकार भी चकित हैं। जिस तरह से अर्नब लगातार सरकार पर हावी हैं उसे देख लग रहा है कि अर्नब का हृदय परिवर्तन हो गया है। हाल ही में उन्होंने 15 करोड़ सालाना ले रहे सुधीर को जमकर लताड़ लगाई थी, इसके बाद अब कुलदीप सेंगर मामले में अर्नब फायर हैं। अर्नब के बदलते रूप को लेकर तीन पत्रकारों का तर्क पढ़िए….
सोहित मिश्रा-
जिस शख्स ने टीवी मीडिया को बर्बाद कर दिया, दिन रात चीख चीख कर दूसरे ऐंकर और रिपोर्टर को भी चीखने की आदत लगवाई, दुनिया भर का पैसा होने के बाद केवल सरकार की चाटुकारिता की, जब प्रवासी मजदूर सड़कों पर चल रहे थे, तब सुशांत सिंह राजपूत की मौत का इस्तेमाल बिहार चुनाव और कोरोना से ध्यान भटकाने के लिए किया।
उस आदमी के दिवालिया होने से पहले सरकार के खिलाफ दो कड़े शब्द के वजह से अगर आप उसके दोबारा से फैन बन रहे हो, तो समझ आता है कि हम कितने बेवकूफ हैं।
यह तो ठीक वैसा ही है कि जबतक अजित पवार विपक्ष में हैं, तबतक भ्रष्टाचारी, जब बीजेपी के साथ, तब देशभक्त और ज़मीन से जुड़ा नेता!
उमाशंकर सिंह-
तुम्हारे लॉजिक में दम है सोहित, लेकिन…
जिस जनता को कोरोना के दिनों का त्राहिमाम याद नहीं, सड़क पर सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के छाले याद नहीं, ऑक्सीजन की क़िल्लत और अपनों का तर्ज़ पर मरना याद नहीं, सरकारी नाकामी और असंवेदनशील रवैया याद नहीं, उस जनता को अर्नब की उस दौरान की भी घटिया एंकरिंग की कहां याद होगी… उसके लिए तो उसका नया रूप blessing in disguise है… भले चंद दिनों का ही हो…
और जहां तक टीवी की बर्बादी की दास्तान है तो वो तो 2007 में भी तब भी लिखी गई थी जब टीवी पर सांप नेवलों की लड़ाई से लेकर स्वर्ग की सीढी तक लगा दी गई थी। हालाँकि वो दौर अलग था लेकिन टीवी को हर दौर में बर्बाद करने वाले अलग अलग तरह के मठाधीश रहे हैं जिन्होंने ख़ुद को पत्रकारिता का प्रधान पादरी साबित करने के लिए अपने आगे कुछ नहीं सोचा। अपना ही नैरेटिव गढते और बांचते रहे। इस पार के या उस पार के। ऐसे कई के माध्यम आज जो भी हों लेकिन वे अपने इको चेंबर में क़ैद होकर रह गए हैं।
और सच में ये घोर निराशा की स्थिति है। ऐसे में कोई किसी का फ़ैन क्या होगा… सब तथाकथित ‘मेन स्ट्रीम मीडिया’ में उम्मीद की किसी भी टिमटिमाई हुई लौ की तरफ़ देखने लगते हैं कि घोर अंधकार का हैलोजन कहीं यही तो नहीं।
नज़र बनी हुई है…मैं आपको अपनी बात कह दी है।





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