अभिषेक उपाध्याय (वरिष्ठ पत्रकार) नोएडा
आजकल मीडिया के गलियारों में एक अजीब सा ‘कोहराम’ मचा है। यह शोर किसी जनहित की खबर का नहीं है, न ही गिरती अर्थव्यवस्था या बेरोजगारी पर है। यह शोर है—’इंटरव्यू की भूख’ का।
एक तथाकथित संपादक जी आजकल परेशान हैं, बल्कि यूं कहें कि दुखी हैं। दुख इस बात का नहीं कि पत्रकारिता का स्तर गिर गया है, बल्कि इस बात का है कि उन्होंने चाटुकारिता की जो ‘झरिया खदान’ खोदी थी, उसमें से इस बार ‘इंटरव्यू’ का कोयला नहीं निकला।
मक्खन की रेस और पराग डेयरी का ‘धोखा’
संपादक जी ने अपनी पूरी ताकत योगी आदित्यनाथ की जय-जयकार में झोंक रखी थी। उन्हें भरोसा था कि उनकी ‘जी-हुजूरी’ का फल मीठा होगा। मगर किस्मत देखिए, उन्होंने मक्खन की इतनी परतें जमा की थीं कि पैर फिसल गया और इंटरव्यू की ‘पराग डेयरी’ का सारा मक्खन टाइम्स नाउ नवभारत ले उड़ा। अब संपादक जी खाली हाथ, नकली विग और असली गुस्से के साथ स्टूडियो में चक्कर काट रहे हैं।
जब ‘सूचना निदेशक’ को भी होने लगे असुरक्षा!
कहते हैं कि संपादक जी की भक्ति इतनी ‘ओरिजिनल’ है कि कभी-कभी प्रदेश के सूचना निदेशक को भी अपनी कुर्सी हिलती नजर आती होगी। उन्हें लगता होगा—”भाई, यह बंदा तो हमसे भी आगे निकल गया!” युद्धक्षेत्र हो या धर्मक्षेत्र, संपादक जी हर खबर में एक ही एंगल ढूंढते हैं—’योगी जी इसे भी दुरुस्त कर देंगे।’
लारेंस बिश्नोई का आतंक? — योगी जी देखेंगे!
हिमाचल की मस्जिद का विवाद? — योगी जी संभालेंगे!
ईरान-इजरायल युद्ध और अमेरिका की प्रलय? — चिंता मत कीजिए, बाबा का बुलडोजर वहाँ भी समाधान दे देगा!
’लिजलिजी’ रीढ़ का कड़वा सच
विडंबना देखिए कि अपनी रीढ़ की हड्डी को चांदनी चौक के मलाई चमचम से भी अधिक मीठा और लचीला बना देने के बाद भी, सत्ता के दरबार में उन्हें कोई पूछने को तैयार नहीं है। यह उन सभी के लिए एक कड़ा सबक है जो सोचते हैं कि पत्रकारिता का रास्ता सत्ता की दहलीज पर बिछ जाने से होकर गुजरता है
निष्कर्ष: अगली पीढ़ी को चेतावनी
संपादकों की वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को इस ‘मलाई चमचम’ ब्रांड की पत्रकारिता से सतर्क हो जाना चाहिए।
अगर आप सत्ता के इतने करीब जाने की कोशिश करेंगे कि आपकी अपनी पहचान धुंधली हो जाए, तो अंत में आप केवल एक ‘फॉलआउट’ (Fallout) बनकर रह जाएंगे।
याद रखिए: जो रीढ़ झुकने के लिए बनी हो, वह बोझ तो सह सकती है, सम्मान नहीं।



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