नई दिल्ली: पत्रकारिता जगत में अक्सर नैतिकता और व्यवहार की बातें होती हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई कभी-कभी कड़वी होती है। हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार एम. अतहरउद्दीन मुन्ने भारती द्वारा साझा किए गए एक फेसबुक पोस्ट ने मीडिया गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। मुन्ने भारती ने सीधे तौर पर संपादक राणा यशवंत के व्यवहार पर निशाना साधते हुए उनके ‘अहंकारी’ रवैये की पोल खोल दी है।
“खुद को चैनल का मालिक समझते हैं राणा यशवंत”
मुन्ने भारती ने अपने पोस्ट में एक बेहद गंभीर और व्यक्तिगत अनुभव साझा किया है। उन्होंने ‘मालिक VS एडिटर’ के एक वीडियो का संदर्भ देते हुए लिखा कि उन्होंने राणा यशवंत को मात्र एक फोन किया था, लेकिन बदले में उन्हें जो जवाब मिला, वह किसी पेशेवर संपादक का नहीं बल्कि एक ‘अघोषित मालिक’ का अहंकार था।
मुन्ने भारती ने अपनी पोस्ट में तीखे शब्दों का प्रयोग करते हुए लिखा:
”जवाब ऐसा जैसे चैनल के खुद मालिक हों, मालिक को कभी कुछ अहसास हुआ होगा तो ऐसे मैदान में उतर गया।”
क्या न्यूज़ रूम में पनप रही है तानाशाही ?
इस पोस्ट ने एक बड़े सवाल को जन्म दे दिया है— क्या बड़े पदों पर बैठे संपादक खुद को संस्थान से ऊपर समझने लगे हैं? मुन्ने भारती का इशारा साफ है कि राणा यशवंत का व्यवहार एक कर्मचारी या सहकर्मी जैसा न होकर किसी तानाशाह जैसा था। यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े संपादक के ‘एटीट्यूड’ को लेकर सार्वजनिक रूप से उंगली उठाई गई हो, लेकिन मुन्ने भारती के इस सीधे हमले ने मामले को गंभीर बना दिया है।
सोशल मीडिया पर चर्चाओं का बाजार गर्म
जैसे ही यह पोस्ट वायरल हुई, नेटिज़न्स और पत्रकार बिरादरी के बीच बहस शुरू हो गई। लोग पूछ रहे हैं कि:
आखिर फोन पर ऐसी क्या बात हुई जिससे मुन्ने भारती को इतना बुरा लगा?
क्या राणा यशवंत अपनी सीमाओं को लांघकर खुद को संस्थान का सर्वेसर्वा समझने लगे हैं ?
क्या यह न्यूज़ चैनलों के भीतर पनप रहे ‘पावर ईगो’ का नतीजा है?
खामोशी पर उठते सवाल
फिलहाल इस पूरे मामले पर राणा यशवंत की तरफ से कोई सफाई या जवाब सामने नहीं आया है। उनकी यह खामोशी मुन्ने भारती के आरोपों को और बल दे रही है। जानकार मान रहे हैं कि यह विवाद केवल दो पत्रकारों के बीच का नहीं है, बल्कि यह उस कार्यसंस्कृति पर प्रहार है जहाँ पद का रसूख शिष्टाचार पर हावी हो जाता है।
चेयरमैन का पक्ष: अनुशासन और मर्यादा सर्वोपरि
चेयरमैन ने इस पूरे विवाद और सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हुई इस पोस्ट को गंभीरता से लिया है। प्रबंधन का मानना है कि:
संस्थान की छवि सर्वोपरि: किसी भी संपादक या कर्मचारी का व्यक्तिगत अहंकार संस्थान की साख से बड़ा नहीं हो सकता। चेयरमैन का कहना है कि “संस्थान में हर पद की अपनी गरिमा है, लेकिन अगर कोई पद का दुरुपयोग कर खुद को अघोषित ‘मालिक’ समझने लगे, तो यह अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है।”
शिष्टाचार की अपेक्षा: चेयरमैन हमेशा से एक ऐसी कार्यसंस्कृति के पक्षधर रहे हैं जहाँ संवाद में शालीनता हो। मुन्ने भारती के आरोपों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शीर्ष पदों पर बैठे लोग चेयरमैन की उदारता का अनुचित लाभ उठा रहे हैं?
जवाबदेही तय होगी: चर्चा है कि चेयरमैन इस मामले में आंतरिक स्पष्टीकरण मांग सकते हैं या विधिक कड़ी कानूनी कार्यवाही करने के विचार में हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संस्थान का कोई भी चेहरा अपनी सीमाओं को न लांघे।






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