Home » प्रिंट » श्रम विभाग के आदेश पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की मुहर,जागरण प्रबंधन की याचिका खारिज,वर्करों की बड़ी जीत

श्रम विभाग के आदेश पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की मुहर,जागरण प्रबंधन की याचिका खारिज,वर्करों की बड़ी जीत

21 Views

प्रयागराज/नोएडा | विशेष संवाददाता देश के सबसे बड़े हिंदी समाचार पत्र समूहों में से एक, दैनिक जागरण और उसके कर्मचारियों के बीच चल रहा दशकों पुराना कानूनी संघर्ष अब एक निर्णायक मोड़ पर आ गया है। श्रम विभाग (नोएडा लेबर कोर्ट) द्वारा वर्करों के पक्ष में दिए गए आदेश को चुनौती देने वाली प्रबंधन की याचिका को माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि रसूख और पहुंच के दम पर कर्मचारियों के कानूनी अधिकारों को अनिश्चितकाल तक नहीं दबाया जा सकता।

श्रम विभाग की जांच में हुई थी पुष्टि

​यह मामला मजीठिया वेज बोर्ड के तहत बकाया वेतन और भत्तों के भुगतान से जुड़ा है। नोएडा के लगभग 200 कर्मचारियों ने वर्ष 2011 में अपनी आवाज बुलंद की थी। श्रम विभाग की लंबी जांच और सुनवाई के बाद लेबर कोर्ट ने कर्मचारियों के दावों को सही पाया था और प्रबंधन को बकाया राशि भुगतान करने का आदेश दिया था। प्रबंधन ने इस आदेश को मानने के बजाय हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा है।

वेतन विसंगति और पीएफ चोरी के गंभीर आरोप

​अदालती दस्तावेजों और कर्मचारियों के दावों के अनुसार, जागरण समूह पर केवल कम वेतन देने का ही नहीं, बल्कि ‘सरकारी चोरी’ का भी आरोप है:

  • न्यूनतम वेतन का उल्लंघन: कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें सरकार द्वारा तय किए गए वेज बोर्ड से बहुत कम वेतन दिया जा रहा था।
  • पीएफ (PF) घोटाला: आरोप है कि कम वेतन दिखाने के कारण कर्मचारियों के पीएफ फंड में भी कम राशि जमा की गई। इससे न केवल वर्कर के भविष्य के साथ खिलवाड़ हुआ, बल्कि सरकार को मिलने वाले पीएफ अंशदान में भी भारी चपत लगी।
  • पद और पहचान का भ्रम: संस्थान पर आरोप है कि वह वर्करों के पद और वेतन पर्ची (Salary Slip) में हेरफेर कर कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाता रहा है।

‘राम बनाम रावण’ का संघर्ष

​सालों से इस लड़ाई को लड़ रहे कर्मचारियों का कहना है कि यह लड़ाई केवल पैसे की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सत्य की है। एक पीड़ित कर्मचारी ने कहा:

“संस्थान खुद को देशभक्त कहता है, लेकिन जो अपने वर्करों का हक मारे और सरकार के पीएफ नियमों में चोरी करे, वह देशभक्त कैसे हो सकता है? यह रावण रूपी अहंकारी प्रबंधन और राम रूपी न्यायप्रिय वर्कर के बीच का संघर्ष है। सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।”

 

अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं निगाहें

​इलाहाबाद हाई कोर्ट से झटका लगने के बाद जागरण प्रबंधन अब माननीय सुप्रीम कोर्ट की शरण में गया है। पिछले दिनों इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में तारीख भी लगी थी। कानून के जानकारों का मानना है कि चूंकि देश भर की विभिन्न अदालतों और श्रम विभागों में प्रबंधन की हार होती आई है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय से भी वर्करों को न्याय मिलने की प्रबल संभावना है।

अखबार जगत में हड़कंप

​इस आदेश के बाद अन्य अखबार समूहों के मालिकों में भी हड़कंप मच गया है। यदि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला वर्करों के पक्ष में आता है, तो देश भर के हजारों मीडिया कर्मियों के लिए बकाया एरियर और सही वेतनमान का रास्ता साफ हो जाएगा।

media4samachar
Author: media4samachar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Live Cricket

Daily Astrology