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करोड़ों का विज्ञापन,पर पत्रकार को मिला ₹175 का इंक्रीमेंट: नींबू की कीमत से भी सस्ता हुआ संवाद न्यूज़ एजेंसी में इंक्रीमेंट

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6 मई, 2026

मुख्य बिंदु:

  • ​बनारस यूनिट के ब्यूरो कार्यालयों में पत्रकारों के बीच भारी निराशा और आक्रोश।
  • ​एजेंसी आधारित बड़े अखबार ने ‘मजदूर दिवस’ पर दिया महंगाई का सबसे क्रूर मजाक।
  • ​कर्मचारियों का तंज: “इतने में तो महीने भर का नींबू भी नहीं आएगा, परिवार कैसे पालें?”

सच की मशाल उठाने वालों के साथ ‘भद्दा’ मजाक

​समाज की कुरीतियों को उजागर करने और जनता के हक की लड़ाई लड़ने वाले पत्रकारों का अपना भविष्य ही अंधकारमय नजर आ रहा है। बनारस स्थित एक बड़े मीडिया संस्थान, जो बाजार से हर माह करोड़ों रुपये का विज्ञापन राजस्व (Revenue) बटोरता है, उसने अपने कर्मचारियों की मेहनत का ऐसा सिला दिया है जिसे सुनकर मीडिया जगत में सनसनी फैल गई है।

​संस्थान ने अपनी खबरों को प्रकाशित करने वाली एजेंसी से जुड़े पत्रकारों को अप्रैल माह की सैलरी के साथ इंक्रीमेंट का ‘तोहफा’ दिया, लेकिन जब 1 मई को कर्मचारियों के खातों में राशि आई, तो खुशी के बजाय वहां मातम जैसा सन्नाटा पसर गया।

मजदूर दिवस पर सम्मान की जगह मिला अपमान

​1 मई को दुनिया ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस’ मना रही थी, ठीक उसी दिन इस संस्थान के पत्रकारों के हाथ में इंक्रीमेंट के नाम पर महज 175 रुपये की बढ़ोतरी आई। लोग पुरानी और नई तनख्वाह का अंतर देखकर हैरान रह गए। कर्मचारियों के बीच यह चर्चा का विषय बन गया है कि करोड़ों के आयोजन करने वाला अखबार अपने कर्मियों की योग्यता का मूल्यांकन 200 रुपये से भी कम में कर रहा है।

“15 रुपये का नींबू और 175 का इंक्रीमेंट”

​बनारस यूनिट के ब्यूरो कार्यालयों में इस वेतन वृद्धि का जमकर उपहास उड़ाया जा रहा है। कर्मियों का कहना है कि आज के महंगाई के दौर में जब एक नींबू 15 रुपये का मिल रहा है, तब ₹175 का इंक्रीमेंट बताता है कि प्रबंधन चाहता है कि पत्रकार खाना-पीना छोड़ दें और केवल नींबू पानी पीकर अखबार को आगे बढ़ाते रहें।

​”यह इंक्रीमेंट नहीं, बल्कि हमारे आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ है। क्या वाकई कंपनी के अधिकारियों को लगता है कि इस मामूली राशि से किसी पत्रकार के परिवार का पेट पल सकता है?” — एक पीड़ित कर्मी (नाम गोपनीय)

 

खौफ के साये में सुलगता आक्रोश

​स्थिति यह है कि पत्रकार अंदर ही अंदर सुलग रहे हैं, लेकिन नौकरी जाने के डर से कोई खुलकर विरोध नहीं कर पा रहा है। कंपनी के अधिकारियों के प्रति भारी नाराजगी है और सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या “सच की आवाज” उठाने वालों का गला इसी तरह आर्थिक रूप से घोंटा जाएगा?

​कर्मचारियों का मानना है कि जो पत्रकार खुद अपना घर चलाने के लिए संघर्ष कर रहा हो, वह समाज की निष्पक्ष आवाज कैसे बना रह सकता है? ‘नींबू पानी’ पीकर जोश कब तक कायम रखा जा सकता है, यह आज बनारस की मीडिया गलियों में सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।

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Author: media4samachar

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