नोएडा: पत्रकारिता जगत में सुचिता और नैतिकता के बड़े-बड़े दावों के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने ‘चौथे स्तंभ’ की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘न्यूज़ इंडिया’ चैनल एक बार फिर विवादों के घेरे में है। ताजा मामला मथुरा के एक जिला संवाददाता से नियुक्ति के नाम पर ₹25,000 की कथित ‘अवैध वसूली’ और उसके बाद उन्हें धोखे से हटाए जाने का है।


साजिश का ‘वेल-स्क्रिप्टेड’ जाल?
मथुरा के पत्रकार फारूक कुरैशी ने चैनल के तीन चेहरों—रवींद्र तिवारी, आलोक द्विवेदी और चैनल हेड अभिनव पांडे—पर मिलीभगत और धोखाधड़ी के संगीन आरोप लगाए हैं। पीड़ित के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया किसी सुनियोजित स्क्रिप्ट की तरह रची गई ताकि उन्हें विश्वास में लेकर पैसे ऐंठे जा सकें।
कदम-दर-कदम ऐसे बुना गया जाल:
पीड़ित पत्रकार द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार घटनाक्रम कुछ इस प्रकार रहा:
- पहला संपर्क: सबसे पहले रवींद्र तिवारी ने फारूक को फोन कर न्यूज़ इंडिया से जुड़ने का प्रलोभन दिया और जल्द नियुक्ति पत्र व आईडी कार्ड दिलाने का भरोसा दिया।
- झांसा और सेटिंग: इसके बाद आलोक द्विवेदी ने फारूक को कथित तौर पर यह समझाया कि उन्हें चैनल हेड अभिनव पांडे से किस तरह बात करनी है ताकि उनकी ‘सेटिंग’ पक्की हो सके।
- ग्रुप में एंट्री: अभिनव पांडे से बातचीत के बाद फारूक को तत्काल चैनल के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ दिया गया, जिससे उन्हें लगा कि प्रक्रिया पूरी तरह आधिकारिक है।
ग्रुप में जुड़ते ही मांगी गई ‘रिश्वत’
आरोप है कि व्हाट्सएप ग्रुप में जुड़ने के महज आधे घंटे के भीतर रवींद्र तिवारी का फोन आया। उन्होंने फारूक से ₹25,000 की मांग करते हुए स्पष्ट कहा कि यह पैसा चैनल हेड और आलोक द्विवेदी के बीच बांटा जाना है और चैनल में बने रहने के लिए यह ‘अनिवार्य’ है। संस्थान से जुड़ने के उत्साह में फारूक ने बिना देर किए बताए गए खाते में राशि ट्रांसफर कर दी।
पैसे मिलते ही बदले तेवर
धोखाधड़ी की पराकाष्ठा तब सामने आई जब पैसे मिलने के मात्र दो दिन बाद फारूक कुरैशी को बिना किसी कारण, बिना नोटिस और बिना किसी आधिकारिक पत्र के असाइनमेंट डेस्क के ग्रुप से ‘रिमूव’ कर दिया गया। जब उन्होंने इस पर स्पष्टीकरण मांगा, तो उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
गंभीर सवाल और ‘मीडिया4समाचार’ की पड़ताल
यह मामला मीडिया जगत के भीतर पनप रहे भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। जब ‘मीडिया4समाचार’ की टीम ने इस मामले पर चैनल प्रबंधन से संपर्क किया, तो वहां से आश्वासन दिया गया कि वे नियुक्ति और पेमेंट से संबंधित पूरा डेटा व आधार साझा करेंगे। लेकिन दो दिन बीत जाने के बाद भी चैनल की ओर से कोई आधिकारिक रिकॉर्ड या जॉइनिंग डेटा नहीं मिल सका है।
उठते सवाल:
- क्या एक राष्ट्रीय चैनल के ‘चैनल हेड’ के नाम पर खुलेआम वसूली हो रही है?
- क्या संस्थान का प्रबंधन इस तरह के गुप्त लेनदेन से अवगत है?
- क्या अब पत्रकारिता में योग्यता की जगह ‘बोली’ लगाकर नियुक्तियां होंगी?
निष्कर्ष:
फारूक कुरैशी ने अब इस मामले को सार्वजनिक करते हुए न्याय की गुहार लगाई है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल धोखाधड़ी का मामला है, बल्कि पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे पर एक गहरा धब्बा भी है।
डिस्क्लेमर: पीड़ित पत्रकार फारूक कुरैशी द्वारा मीडिया4समाचार को भेजे गए पत्र के अनुसार



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