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जनतंत्र टीवी विवाद का सच: तथ्यों के आगे फेल हुए एंकर मीनाक्षी सिसोदिया के आरोप

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नोएडा, 22 जून सैटेलाइट मीडिया के केंद्र नोएडा से संचालित हो रहे समाचार चैनल ‘जनतंत्र टीवी’ में पिछले कुछ दिनों से जारी महिला एंकर विवाद अब एक नया रुख ले चुका है। चैनल के प्रधान संपादक जितेंद्र शर्मा पर महिला एंकर मीनाक्षी सिसोदिया द्वारा सोशल मीडिया और अन्य मंचों के माध्यम से लगाए गए तमाम आरोपों की जमीनी और वित्तीय हकीकत खंगाली गई, तो कहानी कुछ और ही नजर आ रही है। तथ्यों से स्पष्ट है कि यह मामला केवल कामकाजी विवाद का नहीं, बल्कि स्थापित मीडिया नियमों को ताक पर रखकर संस्थान पर अनुचित दबाव बनाने की कोशिशों से जुड़ा हुआ है।

वेतन का पूरा भुगतान हो चुका,फिर किस बात का विवाद?

​महिला एंकर द्वारा संस्थान पर वेतन रोकने और मानसिक प्रताड़ना देने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। लेकिन ‘Media4samachar’ को मिली पुख्ता और आधिकारिक जानकारी के अनुसार, जनतंत्र टीवी प्रबंधन ने नियमानुसार कार्रवाई करते हुए महिला एंकर को उनके एक महीने का पूरा वेतन पहले ही हस्तांतरित (Pay) कर दिया है

​आमतौर पर किसी भी मीडिया संस्थान और कर्मचारी के बीच विवाद की स्थिति में वित्तीय बकाये का भुगतान ही प्राथमिक विषय होता है। जब संस्थान ने अपनी तरफ से सैलरी का पूरा हिस्सा दे दिया, तो उसके बाद एंकर द्वारा लगाए जा रहे ‘सैलरी न देने’ के आरोपों की हवा खुद-ब-खुद निकल जाती है।

नियमों से परे जाकर अतिरिक्त ‘कंपनसेशन’ की जिद

​इस पूरे मामले में जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है, वह है महिला एंकर द्वारा मांगी जा रही अतिरिक्त धनराशि। सूत्रों के मुताबिक, एक महीने की सैलरी मिलने के बावजूद मीनाक्षी सिसोदिया द्वारा संस्थान से अलग से ‘हर्जाने’ (Compensation) और भारी जुर्माने की मांग की जा रही है।

​भारतीय मीडिया इंडस्ट्री के स्थापित कार्य-नियमों और श्रम कानूनों (Labor Laws) के तहत, किसी भी संस्थान में सामान्य सेवा-मुक्ति या इस्तीफे के दौरान तय वेतन और नोटिस पीरियड के पैसों के अलावा किसी भी तरह का अतिरिक्त हर्जाना देने का कोई प्रावधान या परंपरा नहीं है। ऐसे में नियमों से बाहर जाकर अलग से वित्तीय लाभ की मांग करना पूरी तरह से अनुचित और अनैतिक है।

आरोप लगाने का पुराना ढर्रा: पहले भी वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं निशाने पर

​यह पहली बार नहीं है जब उक्त महिला एंकर ने संस्थान के नेतृत्व या सहयोगियों पर सार्वजनिक तौर पर लांछन लगाए हों। इससे पूर्व भी वह इसी चैनल में कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार और क्राइम एडिटर अली शरर पर सोशल मीडिया के माध्यम से गंभीर आरोप लगा चुकी हैं।

​बार-बार चैनल के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों—चाहे वह पूर्व क्राइम एडिटर अली शरर हों या वर्तमान प्रधान संपादक जितेंद्र शर्मा—को सोशल मीडिया पर घसीटना और उनके खिलाफ अभियान चलाना, किसी गहरी पेशेवर कुंठा या फिर दबाव बनाकर व्यक्तिगत हित साधने की सोची-समझी रणनीति की ओर इशारा करता है।

संपादक और संस्थान की कोई जवाबदेही नहीं

​तथ्यों के इस विश्लेषण से यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि जब जनतंत्र टीवी ने अपने हिस्से की कानूनी और वित्तीय जिम्मेदारी (सैलरी पेमेंट) पूरी कर दी है, तो इस मामले में न तो संस्थान की और न ही प्रधान संपादक जितेंद्र शर्मा की कोई कानूनी या नैतिक गलती बनती है। बिना किसी ठोस आधार और बिना किसी नियम के, सिर्फ संस्थान को बदनाम करने की नीयत से चलाए जा रहे इस दुष्प्रचार की मीडिया गलियारों में भी निंदा हो रही है।

Media4samachar हमेशा सत्य और निष्पक्ष पत्रकारिता के सिद्धांतों पर अडिग रहता है। तथ्यों की पड़ताल के बाद यह स्पष्ट है कि इस पूरे प्रकरण में जनतंत्र टीवी प्रबंधन और उसके संपादक के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार और बेबुनियाद हैं।

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Author: media4samachar

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