Atharva Dwivedi-Media4samachar Noida
फिल्मकार अनुराग कश्यप एक बार फिर अपने बेबाक और स्पष्ट विचारों को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में वह प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक भरद्वाज रंगन के पॉडकास्ट में नज़र आए, जहां उन्होंने समकालीन भारतीय सिनेमा, राजनीतिक नैरेटिव और फिल्मों पर लगाए जाने वाले ‘प्रोपेगैंडा’ जैसे आरोपों पर खुलकर अपनी बात रखी। इस बातचीत के दौरान अनुराग कश्यप ने खास तौर पर फिल्म धुरंधर और अभिनेता यश की आने वाली फिल्म टॉक्सिक के टीज़र को लेकर अपनी राय साझा की।
अनुराग कश्यप ने बातचीत में कहा कि ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों को वह एक साहसिक मुख्यधारा की फिल्म मानते हैं। उनके अनुसार, यह ऐसी फिल्म है जो बिना डरे अपने विचार सामने रखती है और आज के दौर में इस तरह की कोशिश करना आसान नहीं है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि जब कोई फिल्म पारंपरिक ढांचे से हटकर कुछ कहने की कोशिश करती है, तो उस पर सवाल उठना तय होता है, लेकिन इससे फिल्म की मंशा पर तुरंत उंगली उठाना सही नहीं है।
वहीं, यश की फिल्म ‘टॉक्सिक’ के टीज़र को लेकर हो रही चर्चाओं पर भी अनुराग कश्यप ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि किसी फिल्म या उसके टीज़र को देखकर उसे तुरंत ‘प्रोपेगैंडा’ करार देना अपने आप में एक तरह का प्रोपेगैंडा बन जाता है। उनके मुताबिक, दर्शकों और आलोचकों को किसी भी फिल्म को पूरी तरह देखने और समझने के बाद ही उस पर निष्कर्ष निकालना चाहिए, न कि केवल कुछ दृश्यों या प्रतीकों के आधार पर।
अनुराग कश्यप का मानना है कि आज के समय में फिल्मों पर राजनीतिक और वैचारिक चश्मे से ज़्यादा जल्दी निर्णय सुना दिए जाते हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सिनेमा एक अभिव्यक्ति का माध्यम है और हर फिल्म का अपना संदर्भ, अपना दृष्टिकोण और अपनी दुनिया होती है। किसी भी रचनात्मक प्रयास को केवल एक नैरेटिव में बांध देना, सिनेमा की आत्मा के साथ अन्याय है।
इस पॉडकास्ट के दौरान अनुराग कश्यप ने यह भी संकेत दिया कि भारतीय सिनेमा में जोखिम लेने वाले फिल्मकारों की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है। उनके अनुसार, अगर फिल्में केवल सुरक्षित रास्ते चुनेंगी, तो सिनेमा का विकास रुक जाएगा। ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों को उन्होंने इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया, जो मुख्यधारा में रहते हुए भी अलग सवाल उठाने की कोशिश करती हैं।
कुल मिलाकर, भरद्वाज रंगन के पॉडकास्ट में अनुराग कश्यप की यह बातचीत सिर्फ दो फिल्मों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आज के भारतीय सिनेमा में विचार, अभिव्यक्ति और आलोचना के बदलते स्वरूप पर एक व्यापक टिप्पणी बनकर सामने आई। ‘धुरंधर’ और ‘टॉक्सिक’ को लेकर उनकी बातों ने एक बार फिर यह बहस तेज़ कर दी है कि क्या फिल्मों को देखने का हमारा नज़रिया ज़्यादा खुला और धैर्यपूर्ण होना चाहिए।





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