नोएडा से संचालित समाचार चैनल APN न्यूज और वहां की एंकर महिला पत्रकारों के बीच चल रहा वेतन विवाद अब निर्णायक मोड़ है। डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी बेबाक पहचान बनाने वाला Media4समाचार इस लड़ाई में पहले दिन से पत्रकारों के साथ खड़ा है। आज इस मामले में श्रम विभाग (Labor Department) में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई, जिसने इस कानूनी लड़ाई को एक नई दिशा दे दी है।
श्रम विभाग में क्या हुआ? (आज की कार्यवाही)
आज की सुनवाई बेहद अहम थी। Media4समाचार को मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, APN न्यूज की प्रबंध निदेशक (MD) राजश्री राय और प्रबंधन की ओर से विभाग के समक्ष अधिवक्ता पेश हुए।
सुनवाई के दौरान चैनल के वकीलों ने मामले के अध्ययन और अपना विस्तृत पक्ष रखने के लिए विभाग से अतिरिक्त समय की मांग की। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद, श्रम विभाग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई के लिए 9 मार्च की तारीख मुकर्रर की है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि प्रबंधन द्वारा समय मांगना इस बात का संकेत है कि मामला अब पूरी तरह कानूनी पेचीदगियों में फंस चुका है।
न्यूज एंकरों का संघर्ष और Media4समाचार का साथ
यह पूरा विवाद न्यूज एंकर्स नेहा शर्मा दुबे, नलिनी सिंह और वक्ता दुबे के बकाया वेतन और कथित उत्पीड़न से जुड़ा है। इन पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि संस्थान ने उनके जायज मेहनताने का भुगतान नहीं किया है।
Media4समाचार ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि:
”जब बड़े मीडिया घरानें अपने ही साथियों का आर्थिक शोषण करने लगें, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कमजोर होता है। Media4समाचार इन महिला पत्रकारों के सम्मान और उनके हक की इस लड़ाई में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।”
क्यों अहम है 9 मार्च की तारीख ?
9 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई इस मामले में ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हो सकती है। उम्मीद जताई जा रही है कि उस दिन चैनल प्रबंधन को अपना अंतिम जवाब और बकाया भुगतान का रोडमैप पेश करना होगा। यदि प्रबंधन संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता है, तो श्रम विभाग सख्त रुख अपनाते हुए आदेश जारी कर सकता है।
पत्रकारिता जगत में सुगबुगाहट
इस मामले ने पूरे मीडिया जगत का ध्यान खींचा है। Media4समाचार द्वारा इस खबर को प्रमुखता से उठाने के बाद, सोशल मीडिया पर भी पत्रकारों के हक में आवाजें बुलंद होने लगी हैं। यह लड़ाई सिर्फ तीन पत्रकारों की नहीं, बल्कि उन तमाम मीडियाकर्मियों की है जो संस्थानों के भीतर शोषण का शिकार होते हैं।



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