टीआरपी की होड़ में कानून की मर्यादा तार-तार; पीड़ितों के इंटरव्यू दिखाने पर कोर्ट ने न्यूज़ चैनलों को घेरा, उठ रहे हैं FIR के सवाल।
प्रयागराज/लखनऊ:

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शंकराचार्य से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में जमानत आदेश पारित करते समय हिंदी समाचार चैनलों की कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगली उठाई है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया है कि कई न्यूज़ चैनलों ने पीड़ितों का साक्षात्कार (इंटरव्यू) लेकर उनका प्रसारण किया, जो सीधे तौर पर पॉक्सो (POCSO) अधिनियम और जुवेनाइल जस्टिस (JJ) एक्ट के स्थापित कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन प्रतीत होता है।
न्यायालय की इस टिप्पणी ने भारतीय मीडिया जगत में हड़कंप मचा दिया है, क्योंकि यह मामला अब केवल नैतिक चूक का नहीं, बल्कि गंभीर कानूनी अपराध की श्रेणी में आ गया है।
## अदालत की टिप्पणी के मुख्य बिंदु
जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान माननीय न्यायालय ने पाया कि मीडिया संस्थानों ने सनसनी फैलाने के चक्कर में बच्चों और पीड़ितों की निजता का सम्मान नहीं किया। कोर्ट के अनुसार:
- पहचान का प्रकटीकरण: पीड़ितों के इंटरव्यू प्रसारित करना उनकी पहचान उजागर करने जैसा है, जो कानूनन प्रतिबंधित है।
- प्रक्रियात्मक उल्लंघन: न्यूज़ चैनलों ने उन सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज किया जो यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने वाले कानून (POCSO) के तहत अनिवार्य हैं।
- मीडिया की जवाबदेही: अदालत ने मीडिया के आचरण पर सवाल उठाते हुए इसे पत्रकारिता की स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध बताया।
### क्या कहता है कानून? (विधिक विश्लेषण)
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, न्यूज़ चैनलों की यह कार्रवाई उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा सकती है:
- पॉक्सो एक्ट की धारा 23: यह धारा स्पष्ट करती है कि कोई भी व्यक्ति (मीडिया सहित) किसी बच्चे के संबंध में ऐसी कोई रिपोर्ट प्रकाशित या प्रसारित नहीं करेगा जिससे उसकी पहचान उजागर हो। इसका उल्लंघन करने पर 6 महीने से 2 साल तक के कारावास का प्रावधान है।
- जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 74: यह धारा किसी भी जांच या अदालती कार्यवाही के दौरान बच्चे का नाम, पता, फोटो या स्कूल की जानकारी सार्वजनिक करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है।
## वरिष्ठ पत्रकारों ने उठाए तीखे सवाल
इस प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने तीखा प्रहार किया है। उन्होंने न्यूज़ चैनलों की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा:
“क्या उन्हें कानून की बेसिक जानकारी भी नहीं? या फिर वे ‘धरती के नए ईश्वर’ को प्रसन्न करने की खातिर कानून और संविधान की स्थापित मान्यताओं का सरेआम चीरहरण कर रहे थे?”
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या सरकार इन चैनलों पर FIR दर्ज करेगी या फिर इन्हें संरक्षण दिया जाएगा?
### मीडिया जगत में भविष्य के संकेत
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) इन दोषी चैनलों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगा?
- NBDSA की कार्रवाई: न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी इन चैनलों पर भारी जुर्माना लगा सकती है।
- लाइसेंस रद्द होने का खतरा: यदि यह साबित होता है कि चैनलों ने जानबूझकर ‘प्रोग्राम कोड’ का उल्लंघन किया है, तो उनके प्रसारण लाइसेंस पर भी आंच आ सकती है।
निष्कर्ष:
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं है, बल्कि उन न्यूज़ रूम्स के लिए चेतावनी है जहाँ ‘टीआरपी’ को संविधान और कानून से ऊपर रखा जाता है। Media4samachar इस मामले की कानूनी प्रगति पर लगातार नज़र बनाए हुए है।





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