नई दिल्ली/जयपुर: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ‘ज़ी राजस्थान’ के पूर्व रीजनल हेड आशीष दवे के खिलाफ दर्ज ब्लैकमेलिंग और रंगदारी की एफआईआर (FIR) को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले में न केवल दवे को राहत दी, बल्कि राजस्थान पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी तीखे सवाल खड़े किए।
क्या था पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब ज़ी मीडिया प्रबंधन ने जयपुर के अशोक नगर थाने में अपने ही तत्कालीन रीजनल हेड आशीष दवे और कुछ अन्य कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।
- आरोप: प्रबंधन ने उन पर धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और कदाचार के आरोप लगाए थे।
- घटना: चैनल का दावा था कि एक आंतरिक जांच के दौरान सीसीटीवी फुटेज में एक कर्मचारी लॉकर से ₹5 लाख लेकर भागता हुआ दिखाई दिया था।
- दबाव: इन आरोपों के आधार पर प्रबंधन ने आशीष दवे और उनके साथियों से इस्तीफे की मांग की थी।
इसके बाद दवे ने कानूनी राहत के लिए निचली अदालत और फिर राजस्थान हाई कोर्ट का रुख किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने पुलिस को जांच पूरी करने का निर्देश तो दिया, लेकिन एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट की राजस्थान पुलिस को ‘फटकार’
पीठ ने सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा दिखाई गई “अति-सक्रियता” पर हैरानी जताई। अदालत की टिप्पणियों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. प्रारंभिक जांच का अभाव
अदालत ने कहा कि ब्लैकमेलिंग जैसे गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज करने से पहले जांच अधिकारी (IO) को प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) करनी चाहिए थी। बिना किसी ठोस आधार के सीधे आपराधिक मामला दर्ज करना कानून सम्मत नहीं है।
2. प्रभावशाली संस्थान का ‘दबाव’?
सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत ही चुभता हुआ सवाल पूछा—
“क्या अगर कोई सामान्य नागरिक ऐसी ही शिकायत लेकर पुलिस के पास जाता, तो क्या पुलिस इसी तत्परता और फुर्ती के साथ मामला दर्ज करती?” अदालत ने संकेत दिया कि शिकायतकर्ता एक प्रभावशाली मीडिया हाउस था, इसलिए पुलिस ने बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में कार्रवाई की।
3. स्पष्ट आरोपों की कमी
पीठ इस बात से “आश्चर्यचकित” थी कि एफआईआर में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं था कि आशीष दवे ने ऐसा कौन सा विशिष्ट कार्य किया जिसे ब्लैकमेलिंग या रंगदारी की श्रेणी में रखा जाए। ठोस तथ्यों के बिना किसी को अपराधी बनाना न्यायसंगत नहीं है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला उन संस्थानों के लिए एक चेतावनी है जो अपने पद और प्रभाव का उपयोग करके पूर्व कर्मचारियों को कानूनी उलझनों में फंसाते हैं। साथ ही, यह पुलिस को भी याद दिलाता है कि उन्हें ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश’ मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए, जिसमें कुछ मामलों में एफआईआर से पहले जांच अनिवार्य है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट द्वारा एफआईआर रद्द किए जाने के बाद आशीष दवे पर चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियां अब समाप्त हो गई हैं। अदालत का यह रुख व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून के दुरुपयोग के खिलाफ एक बड़ी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।





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