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मंत्री संजय निषाद के ‘पत्रकार सम्मान’ में बड़ा हंगामा,250 ग्राम गुझिया देख 4tv न्यूज चैनल की महिला पत्रकार सहित अन्य पत्रकारों ने किया हंगामा

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘निषाद पार्टी’ के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री संजय निषाद अक्सर अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं, लेकिन इस बार मामला उनके द्वारा आयोजित एक ‘पत्रकार सम्मान समारोह’ को लेकर गरमा गया है। होली के उपलक्ष्य में आयोजित इस स्नेह मिलन कार्यक्रम में उस समय स्थिति असहज हो गई, जब मौजूद पत्रकारों के एक बड़े धड़े ने सम्मान के नाम पर दी जा रही ‘पाव भर गुझिया’ को अपनी गरिमा के खिलाफ बताते हुए वापस कर दिया।

​सम्मान या खानापूर्ति? कार्यक्रम की शुरुआत में ही मचा बवाल

​प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कार्यक्रम की शुरुआत तो सामान्य हुई थी, लेकिन जैसे ही जलपान और उपहार वितरण का समय आया, माहौल बदल गया। पत्रकारों को 250 ग्राम गुझिया के छोटे डिब्बे थमाए जाने लगे। मौके पर मौजूद वरिष्ठ पत्रकारों ने इसे ‘पत्रकारिता का उपहास’ करार दिया। विरोध स्वरूप कई पत्रकारों ने मंच के पास ही डिब्बे छोड़ दिए और कार्यक्रम का बहिष्कार कर बाहर निकल आए।

​भीड़ पर उठे सवाल: ‘यूट्यूबर’ और ‘विज्ञापनबाज’ पत्रकारों का जमावड़ा

​इस विवाद की एक बड़ी वजह कार्यक्रम में आमंत्रित लोगों की प्रोफाइल भी रही। राजधानी के मान्यता प्राप्त और सक्रिय पत्रकारों का आरोप है कि समारोह में असली रिपोर्टर्स के बजाय ऐसे लोगों की भीड़ ज्यादा थी जो:
​केवल आरएनआई (RNI) पंजीकरण और डीएवीपी (DAVP) के नाम पर सरकारी विज्ञापन डकारने में सक्रिय हैं।
​जिनका जमीनी रिपोर्टिंग या जनसरोकार से कोई लेना-देना नहीं है।
​तथाकथित ‘मोहल्लेबाज’ यूट्यूबर, जो केवल मोबाइल लेकर भीड़ का हिस्सा बनते हैं।
​एक स्थानीय पत्रकार ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “जब सरकार और मंत्री गंभीर पत्रकारों और विज्ञापन बटोरने वाले ‘फेक’ प्रकाशनों के बीच अंतर करना बंद कर देते हैं, तो ऐसे ही विवाद पैदा होते हैं। पत्रकारिता कोई खैरात नहीं, बल्कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।”

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की भूमिका पर प्रश्नचिह्न

​इस घटनाक्रम ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या विभाग के पास सक्रिय और निष्क्रिय पत्रकारों की कोई स्पष्ट सूची नहीं है? पत्रकारों का आरोप है कि विज्ञापन की मलाई काटने वाले कई प्रकाशन केवल कागजों पर जीवित हैं और ऐसे कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने के काम आते हैं।
​विवाद के तीन बड़े कारण (विश्लेषण)
​टोकन रिस्पेक्ट बनाम रियल रिस्पेक्ट: पत्रकारों का मानना है कि यदि मंत्री सम्मान करना चाहते थे, तो वह एक गरिमापूर्ण चर्चा या संवाद हो सकता था, न कि महज मिठाई का एक छोटा डिब्बा।
​मान्यता का संकट: डिजिटल मीडिया के दौर में ‘पत्रकार’ की परिभाषा धुंधली हो गई है। हर मोबाइल धारक खुद को पत्रकार बताकर सरकारी सुविधाओं और सम्मान का हकदार बन रहा है, जिससे पेशेवर पत्रकारों में भारी रोष है।
​राजनीतिक पीआर (PR): आरोप है कि यह कार्यक्रम पत्रकारों के सम्मान के लिए कम और मंत्री की ब्रांडिंग के लिए ज्यादा था, जिसमें पत्रकारों को केवल ‘संख्या बल’ के रूप में इस्तेमाल किया गया।

निष्कर्ष: साख बचाने की चुनौती

​फिलहाल, इस घटना के वीडियो और खबरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। राजनीतिक हलकों में इसे मंत्री संजय निषाद की एक रणनीतिक चूक माना जा रहा है। वहीं, मीडिया संगठनों के भीतर इस बात पर मंथन शुरू हो गया है कि भविष्य में ऐसे ‘दिखावटी’ सम्मान समारोहों का हिस्सा बना जाए या नहीं।

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Author: media4samachar

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