लखनऊ। सहारा समूह पर कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। वर्षों से निवेशकों का पैसा फंसा होने और अदालतों में मामले अटके रहने के बाद अब एक बार फिर न्याय की उम्मीदें जगी हैं। सहारा इंडिया के डिप्टी मैनेजिंग वर्कर ओ.पी. श्रीवास्तव के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है, उन्हें भगोड़ा घोषित किया गया है और संपत्ति कुर्क करने का आदेश भी जारी हो चुका है। इसके बावजूद, उनकी गिरफ्तारी न होने से निवेशकों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या ताकत और रसूख के दम पर अब भी “सेटिंग-मैनेजमेंट” का खेल चल रहा है।
लखनऊ के गोमतीनगर स्थित सहारा सिटी को खाली कराने का आदेश नगर निगम और विकास प्राधिकरण ने जारी कर दिया है। निर्धारित समय सीमा खत्म हो चुकी है और अब सीलिंग व कब्ज़ा प्रक्रिया की तैयारी है। सहारा भवन, जो कभी सुब्रत राय सहारा के साम्राज्य का प्रतीक माना जाता था, आज गिरती साख और ढहते साम्राज्य का प्रतीक बन गया है।
भले ही न्याय की प्रक्रिया धीमी है, लेकिन हालिया कार्रवाइयों ने निवेशकों को भरोसा दिया है कि अब कानून का शिकंजा बचने वाला नहीं। यदि सरकार, अदालत और एजेंसियां मिलकर पारदर्शी कार्रवाई करती हैं और सहारा समूह की संपत्तियों को नीलाम कर सहारा-सेबी खाते में रकम जमा कराती हैं, तो आने वाले समय में यह मामला भारतीय आर्थिक इतिहास में जवाबदेही और न्याय की मिसाल बन सकता है।





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