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न्यूज़ इंडिया एक्सक्लूसिव: चेयरमैन को ‘चूना’ लगाने वाले एडिटर गैंग का भंडाफोड़,जालसाजी (420) और साजिश (120B) के ‘सेक्शन’ में कथित प्रधान संपादक

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नई दिल्ली/नोएडा | ‘न्यूज़ इंडिया’ (News India) के भीतर चल रहे सत्ता के खेल में एक नया और सनसनीखेज मोड़ सामने आया है। नैतिकता और शुचिता का चोला ओढ़े ‘प्रधान संपादक’ राणा यशवंत पर आरोप है कि उन्होंने संस्थान के चेयरमैन के भरोसे का फायदा उठाते हुए चैनल को अपनी ‘निजी भर्ती एजेंसी’ बना दिया। योग्यता को ताक पर रखकर केवल अपने करीबियों, परिचितों और चेलों को मलाईदार पदों पर बिठाने का खेल खेला गया।

चेयरमैन की पीठ में छुरा: विश्वासघात (Section 406/409) का बड़ा खेल

​संस्थान के चेयरमैन ने जिस भरोसे के साथ चैनल की कमान ‘प्रधान संपादक’ और उनकी टीम को सौंपी थी, उसका इस्तेमाल केवल अपनी और अपने ‘चेलों’ की जेबें भरने के लिए किया गया।

  • वित्तीय सेंधमारी: ₹10 लाख प्रति माह के सैलरी बजट को बढ़ाकर ₹30 लाख तक पहुँचा दिया गया। चेयरमैन को ‘साहित्य’ और ‘बौद्धिक कंटेंट’ का झांसा देकर लाखों रुपये फालतू खर्च कराए गए।
  • साजिश का जाल (Section 120B): यह केवल कुप्रबंधन नहीं, बल्कि एक सुनियोजित Criminal Conspiracy थी, जिसमें फर्जी नियुक्तियां कर चेयरमैन के फंड को निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।

जालसाजी (Section 420): ₹10 लाख का बजट पहुँचाया ₹30 लाख

​चेयरमैन को व्यावसायिक ग्रोथ का सपना दिखाकर मासिक सैलरी बजट को ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹30 लाख प्रति माह तक पहुँचा दिया गया।

  • बौद्धिक झांसा: करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी चैनल को आम दर्शकों से जोड़ने के बजाय, इसे केवल ‘साहित्यकारों के इंटरव्यू’ तक सीमित रखा गया।
  • निजी पीआर: आरोप है कि चेयरमैन के निवेश का इस्तेमाल संपादक जी ने अपनी व्यक्तिगत ब्रांडिंग और रसूख बढ़ाने के लिए किया, जबकि चैनल की रीच (Reach) लगातार गिरती रही।

धोखाधड़ी (Section 420) का पुख्ता प्रमाण: दो माफीनामे

​मीडिया4समाचार के पास मौजूद दो माफीनामे चेयरमैन के खिलाफ रची गई इस साजिश का सबसे बड़ा सबूत हैं। इन पत्रों में ‘चेलों’ ने स्वीकार किया है कि उन्होंने फर्जी तरीके से नियुक्तियां लीं और सैलरी बढ़वाई। कानून के मुताबिक, ये माफीनामे अदालत में धारा 420 (Cheating) को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।

​मीडिया4समाचार (Media4samachar) के पास मौजूद दो विशेष माफीनामे इस पूरे ‘भर्ती घोटाले’ की पुष्टि करते हैं। इन पत्रों में उन चेलों ने अपनी गलती स्वीकार की है जिन्हें नियमों को ताक पर रखकर भर्ती किया गया था। ये दस्तावेज चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि कैसे चेयरमैन की नाक के नीचे विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) का खेल खेला गया।

चेयरमैन के भरोसे के साथ खिलवाड़

​सवाल यह उठता है कि जिस चेयरमैन ने अपनी गाढ़ी कमाई संस्थान में लगाई, उन्हें यह क्यों नहीं बताया गया कि उनके फंड का इस्तेमाल केवल एक खास ‘लॉबी’ को पालने के लिए हो रहा है?

संस्कारशाला की आड़ में फ्रॉड की पाठशाला?

​चेयरमैन को नैतिकता और संस्कारों का पाठ पढ़ाने वाले संपादक जी से आज सवाल पूछा जा रहा है:

  • ​क्या चेयरमैन को अंधेरे में रखकर संस्थान का पैसा ठिकाने लगाना ही आपका संस्कार है?
  • ​क्या साहित्यकारों के इंटरव्यू की आड़ में करोड़ों का खर्च बढ़ाना चेयरमैन के साथ धोखाधड़ी नहीं है?
  • ​क्या इन चेलों और इनके आकाओं पर चेयरमैन की गरिमा को ठेस पहुँचाने और जालसाजी का मुकदमा (FIR) दर्ज नहीं होना चाहिए?

संपादकीय टिप्पणी: किसी भी संस्थान का चेयरमैन इंजन की तरह होता है, लेकिन अगर चालक (संपादक) ही डिब्बों में अपने परिचितों को बिना टिकट बिठाने लगे, तो ट्रेन का पटरी से उतरना तय है। न्यूज़ इंडिया में हुआ यह ‘भर्ती कांड’ मीडिया जगत के लिए एक बड़ा सबक है।

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Author: media4samachar

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