Ahhishek Upadhyay (Senior Journalist) Noida
पत्रकारिता के गलियारों में इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी है। यह बेचैनी किसी जनहित के मुद्दे को लेकर नहीं, बल्कि ‘मक्खन’ छिन जाने के गम में है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक ताज़ा इंटरव्यू ने दिल्ली और लखनऊ के कई न्यूज़ रूम्स में ‘कोहराम’ मचा दिया है।
विशेषकर उन संपादकों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हैं, जिन्होंने अपनी कलम को गिरवी रखकर ‘भक्ति’ का नया कीर्तिमान स्थापित किया था।
जब चाटुकारिता का ‘निवेश’ डूबा
कहा जा रहा है कि एक विगधारी संपादक जी ने मुख्यमंत्री का इंटरव्यू पाने के लिए झरिया की कोयला खदानों से भी अधिक गहरी चाटुकारिता की खुदाई कर रखी थी।
उनके चैनल पर ‘योगी चालीसा’ का पाठ इस कदर होता है कि प्रदेश के सूचना निदेशक भी अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगते होंगे। लेकिन अफसोस! जब फसल काटने का वक्त आया, तो ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ सारा मक्खन (इंटरव्यू) निकालकर ले गया।
ईरान-इज़रायल युद्ध और ‘योगी समाधान’
संपादक जी की रचनात्मकता की दाद देनी होगी। उनके न्यूज़ रूम में दुनिया की हर समस्या का एक ही वैश्विक समाधान है— योगी आदित्यनाथ।
हिमाचल की मस्जिद हो या लॉरेंस बिश्नोई का आतंक? “योगी ठीक कर देंगे!”
ईरान-इज़रायल में मिसाइलें चल रही हों? “योगी का खौफ वहाँ भी है!”
अमेरिका में प्रलय की आहट हो? “बुलडोजर मॉडल ही बचाएगा!”
नकल में माहिर इन संपादक जी ने युद्धक्षेत्र से लेकर धर्मक्षेत्र तक हर जगह दूसरों के आइडिया चुराए, लेकिन ‘जी-हुजूरी’ के मामले में उन्होंने मौलिकता (Originality) बनाए रखी।
रीढ़ की हड्डी और मलाई चमचम
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई पत्रकार अपनी रीढ़ की हड्डी को चांदनी चौक की ‘मलाई चमचम’ से अधिक मीठा और लचीला बना लेता है, तो उसकी स्थिति ‘बिन पेंदी के लोटे’ जैसी हो जाती है। सत्ता को भी पता होता है कि जो पहले से ही चरणों में लेटा है, उसे और क्या सम्मान देना? सम्मान हमेशा उसका होता है जो आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछने का साहस रखता है।
”पत्रकारिता का यह दौर इतिहास में ‘मक्खन और विग’ के युग के नाम से जाना जाएगा, जहाँ संपादक खबर नहीं, बल्कि अपनी वफादारी का विज्ञापन चला रहे हैं।”
भावी पीढ़ी को सीख
आज की स्थिति उन युवा पत्रकारों के लिए एक कड़वा सबक है जो शार्टकट और चाटुकारिता के दम पर ऊंचाइयां छूना चाहते हैं। यदि आप अपनी साख बेचकर सत्ता की पालकी ढोएंगे, तो अंत में आपके हाथ केवल खाली कटोरा ही आएगा, क्योंकि सत्ता हमेशा ‘प्रभाव’ को चुनती है, ‘पैर सहलाने वालों’ को नहीं।



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