नोएडा | Media4samachar
दिल्ली-एनसीआर के मीडिया गलियारों में इन दिनों ‘मालिक पटाओ, माल बनाओ’ अभियान चलाने वाले कथित संपादकों के एक बड़े गैंग की चर्चा गर्म है। ताज़ा मामला न्यूज़ इंडिया 24×7 चैनल का है, जहाँ नैतिकता और आदर्शों की बात करने वाले राणा यशवंत पर गंभीर वित्तीय हेराफेरी, अपनों को रेवड़ियाँ बाँटने और संस्थान को चूना लगाने के संगीन आरोप लगे हैं।
भरोसे का कत्ल: मालिक की जेब और चेलों की मौज
सूत्रों के अनुसार, चैनल के मालिक और बिल्डर शैलेंद्र शर्मा ने राणा यशवंत पर भरोसा कर उन्हें संस्थान की पूरी जिम्मेदारी सौंपी थी। लेकिन संपादक जी ने इस भरोसे का इस्तेमाल संस्थान को आगे बढ़ाने के बजाय अपना निजी ‘इकोसिस्टम’ खड़ा करने में किया।
आरोप है कि:
- पुराने स्टाफ की बलि: संस्थान में आते ही सबसे पहले उन पुराने और ईमानदार कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया जो राणा के ‘सिंडिकेट’ के रास्ते में रोड़ा बन सकते थे।
- करीबियों की फौज: ऑफिस की हर गतिविधि पर नियंत्रण रखने के लिए अपनी अत्यंत करीबी और ‘कंसल्टेंट’ पूजा शर्मा गुप्ता को HR विभाग की कमान सौंप दी गई।
- सैलरी का फर्जीवाड़ा: जो मंथली सैलरी बजट 10 लाख रुपये के आसपास होना चाहिए था, उसे चहेतों की भर्ती और जबरन सैलरी हाइक के जरिए 30 लाख रुपये प्रति माह तक पहुँचाने की साजिश रची गई।
- आरोप है की ऑफिस के न्यूजरूम की कोई बात बाहर तक न पहुंचे इसके लिए भी राणा यशवंत पूरी ताकत झोंके हुए थे लेकिन इसमें भी सफलता नहीं प्राप्त हुई,अगर गलती से कोई बात बाहर तक पहुंच गई तो राणा यशवंत उस पत्रकार को नौकरी से निकालने से लेकर अन्य तरह की धमकियां बंद कमरे में देते थे
साहित्य की आड़ में ‘धोखाधड़ी’ का खेल
मीडिया जगत में यह चर्चा आम है कि जहाँ एक तरफ न्यूज़ चैनल टीआरपी और हार्ड न्यूज़ के लिए जूझते हैं, वहीं राणा यशवंत ने चैनल के संसाधनों का उपयोग अपने व्यक्तिगत संबंधों को साधने और ‘साहित्यकारों’ के लंबे-लंबे इंटरव्यू प्रसारित करने में किया। वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि आज के दौर में जब दर्शक खबर ढूंढ रहा है, तब ‘खलिहर’ लोगों के लिए साहित्य की आड़ में संस्थान का पैसा बर्बाद करना वित्तीय धोखाधड़ी से कम नहीं है।
वरिष्ठ पत्रकारों का गुस्सा: “संपादक नहीं, खुद को मालिक समझते थे”
Media4samachar से बातचीत में कई वरिष्ठ पत्रकारों ने कड़वे अनुभव साझा किए। उनका कहना है कि जब भी किसी प्रोफेशनल काम के लिए राणा यशवंत को कॉल किया गया, तो उनका व्यवहार एक संपादक जैसा नहीं बल्कि किसी अंहकारी ‘चैनल मालिक’ जैसा होता था। उनके एटीट्यूड और कार्यशैली ने कई अनुभवी पत्रकारों को निराश किया।
“क्या यह फ्रॉड किसी संस्कारशाला की उपज है?”
“नैतिकता और मर्यादा की लक्ष्मणरेखा की दुहाई देने वाले संपादक जी से यह पूछा जाना चाहिए कि उनके चेलों द्वारा लिखे गए ‘माफीनामे’ किस संस्कार के प्रतीक हैं? क्या इस सुनियोजित साजिश के लिए उन पर गंभीर धाराओं में मुकदमा नहीं चलना चाहिए?”
माफीनामे ने खोली पोल
इस पूरे खेल का सबसे पुख्ता सबूत वे दो माफीनामे हैं, जो कथित तौर पर राणा यशवंत के चेलों द्वारा लिखे गए हैं। ये पत्र साफ इशारा करते हैं कि किस तरह फर्जी नियुक्तियां की गईं और सैलरी बढ़ाकर संस्थान को लूटा गया। समय रहते चैनल मालिक शैलेंद्र शर्मा ने इस ‘गैंग’ की मंशा भांप ली और इनका ‘इलाज’ कर दिया, वरना संस्थान दिवालिया होने की कगार पर पहुँच जाता।

निष्कर्ष: मीडिया में ‘दीमकों’ से सावधान
यह घटना उन सभी मीडिया मालिकों के लिए एक सबक है जो बाहरी चमक-धमक देखकर संपादकों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं। ऐसे लोग जो संस्थान को ‘लूटने’ का जरिया समझते हैं, उन्हें किसी भी बड़े संस्थान में जगह नहीं मिलनी चाहिए।





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