उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) जिले में कानून व्यवस्था और पुलिस की निष्पक्षता पर एक बार फिर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है। मामला केवल एक अपराध का नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के आदेशों की सरेआम अवहेलना का है। बीटा-2 पुलिस थाना की कार्यप्रणाली ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या पुलिस प्रशासन खुद को अदालत से ऊपर समझने लगा है?
घटनाक्रम: जब एक पत्रकार पर हुआ जानलेवा हमला
मामला 14 नवंबर 2018 की रात का है। शिकायतकर्ता पत्रकार मिताली चंदोला के अनुसार, उन पर बाइक सवार हमलावरों ने न केवल कई राउंड गोलियां चलाईं, बल्कि उन पर एसिड (तेजाब) भी फेंका गया। एक महिला पत्रकार पर इस तरह का बर्बर हमला राजधानी से सटे इलाके में कानून की धज्जियां उड़ाने वाला था। घटना के बाद एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ।
जांच में ‘झोल’: साक्ष्यों को दफनाने की कोशिश?
जांच के दौरान पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही। आरोप है कि जांच अधिकारी ने कई अहम साक्ष्यों को जानबूझकर नजरअंदाज किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) ने इस पर संज्ञान लिया और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए केस को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट स्थानांतरित कर दिया।
जब पटियाला हाउस कोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा की, तो पुलिसिया जांच की कलई खुल गई:
- अधूरी FSL रिपोर्ट: पुलिस ने घटनास्थल से बरामद नमूनों की फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) रिपोर्ट आने का इंतजार तक नहीं किया और मामले को बंद करने की फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी।
- संदिग्ध CDR: कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) न तो प्रमाणित थे और न ही संबंधित सेवा प्रदाता के नोडल अधिकारी को गवाह बनाया गया।
- धाराओं की ‘हेराफेरी’: एसिड हमले के स्पष्ट साक्ष्य होने के बावजूद, पुलिस ने जानबूझकर धारा 326B IPC (एसिड हमले का प्रयास) को केस से हटा दिया, ताकि आरोपियों को कानूनी लाभ मिल सके।
अदालत का सख्त आदेश और पुलिस की ‘चुप्पी’
अदालत ने इन खामियों को न्याय का मजाक माना और पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए ‘फर्दर इन्वेस्टिगेशन’ (आगे की जांच) के आदेश दिए। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि:
- फॉरेंसिक रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लाया जाए।
- प्रमाणित CDR और CAF (Customer Application Form) पेश किए जाएं।
- सभी महत्वपूर्ण गवाहों के बयान कानूनन प्रक्रिया के तहत दोबारा दर्ज किए जाएं।
हैरानी की बात यह है कि पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा यह आदेश पारित किए हुए करीब एक साल बीत चुका है, लेकिन बीटा-2 थाना पुलिस ने आज तक इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की।
वर्दी पर दाग: कांस्टेबल पर आरोपियों से मिलीभगत का आरोप
पीड़िता मिताली चंदोला ने जो आरोप लगाए हैं, वे और भी चौंकाने वाले हैं। पीड़िता के अनुसार, जब वह स्वयं कोर्ट का आदेश लेकर बीटा-2 थाने पहुँचीं, तो इंस्पेक्टर शिव सिंह के निर्देश के बावजूद कांस्टेबल लोकेश ने आदेश की ‘रिसीविंग’ (पावती) देने से साफ मना कर दिया।
इतना ही नहीं, आरोप है कि कांस्टेबल लोकेश ने जगत फार्म में रहने वाले आरोपियों को तुरंत इस अदालती आदेश की जानकारी दे दी। यह सीधे तौर पर अपराधियों को संरक्षण देने और पीड़िता की जान को फिर से खतरे में डालने जैसा कृत्य है।
पत्रकार मिताली चंदोला ने अब सोशल मीडिया (X) के माध्यम से सीधे नोएडा सीपी से न्याय की गुहार लगाई है। यह मामला अब केवल एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं, बल्कि उस भरोसे की परीक्षा है जिस पर हमारी न्याय व्यवस्था टिकी है।





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