नई दिल्ली/लखनऊ: दशकों तक हिंदी पत्रकारिता और कॉर्पोरेट जगत में अपना दबदबा रखने वाले सहारा इंडिया परिवार का मीडिया संस्थान ‘राष्ट्रीय सहारा’ (Rashtriya Sahara) अब अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ हफ्तों में संस्थान के विभिन्न केंद्रों—दिल्ली, नोएडा, लखनऊ और गोरखपुर—से वरिष्ठ पत्रकारों और कर्मचारियों के सामूहिक इस्तीफों ने मीडिया जगत में खलबली मचा दी है।
लेकिन इस इस्तीफे के दौर के पीछे एक बड़ी खबर तैर रही है— सहारा मीडिया की कमान अब नए हाथों में जा सकती है।
इस्तीफों की झड़ी और प्रबंधन का संकट
कर्मचारियों का आरोप है कि पिछले कई सालों से वेतन (Salary) की अनियमितता और पीएफ (PF) न मिलने के कारण उनमें भारी रोष है। हाल ही में गोरखपुर यूनिट में हुए ‘कपड़ाफाड़’ ड्रामे के बाद असंतोष की यह आग और भड़क गई है। सूत्रों के अनुसार, प्रबंधन अब ‘कॉस्ट कटिंग’ के नाम पर अनुभवी पत्रकारों पर इस्तीफा देने का दबाव बना रहा है, जिसके विरोध में कई संपादकीय प्रमुखों ने पद छोड़ दिया है।
कौन होगा नया ‘सहारा’?
मीडिया गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि सहारा ग्रुप की संपत्तियों को लेकर चल रही कानूनी प्रक्रियाओं के बीच, ‘राष्ट्रीय सहारा’ अखबार और सहारा समय (Sahara Samay) चैनल की कमान कोई बड़ा कॉर्पोरेट घराना या स्थापित मीडिया ग्रुप संभाल सकता है।
कर्मचारियों के सामने ‘करो या मरो’ की स्थिति
इस्तीफा देने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया:
”हम वर्षों से इस उम्मीद में काम कर रहे थे कि हालात सुधरेंगे, लेकिन अब 70 साल के अधिकारी मलाई खा रहे हैं और 40 साल के नौजवानों को घर भेजा जा रहा है। ऐसे में इस्तीफे के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।”
जानकारों का मानना है कि जल्द ही नए मालिक या निवेशक कमान संभाल सकते हैं जिनका नाम पहले से तय हैं और पहले से ही वो एक न्यूज चैनल के चेयरमैन/एडिटर इन चीफ हैं तो भारत का यह प्रतिष्ठित समाचार पत्र जल्द वापसी कर सकता हैं
नए मैनेजमेंट के आने की खबरों ने कर्मचारियों के एक वर्ग में उम्मीद भी जगाई है कि शायद उनका बकाया वेतन मिल जाए और संस्थान को नई दिशा मिले।





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