अभिषेक उपाध्याय (वरिष्ठ पत्रकार)
मीडिया के सबसे ‘ठरकी’ संपादक से जुड़ी ख़बर है ये।
संपादक महोदय का ‘तलाक़’ अब ‘लॉक’ हो गया है।
नोटिस जा चुकी है।
वजह मारपीट है!!
समय साक्षी है कि मीडिया के पूरे इतिहास में इतना ठरकी संपादक नहीं हुआ होगा।
कुत्ता-बिल्ली-भूत-प्रेत-नाग-नागिन पर ख़बरें बनाने वाले भी इस दौर में संपादक समझे गए हैं,
यही इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है!!
न्यूज़रूम की लड़कियों को संपादकीय केबिन की खुली खिड़की समझने वाले,
वामपंथ की खूँटी पर खुद को टांगकर कब नारीवाद का ब्रांडेड ओवरकोट बन गए, किसी को समझ ही न आया!!
कल पत्रकार थे, आज फिल्मकार हैं मगर अपनी आदतों में आज भी सौंदर्य का नयन बलात्कार हैं।
चंगुल से छूटी उस स्त्री के लिए नवजीवन की अनंत शुभकामनाओं के साथ,
महान कवि धूमिल की एक कविता उन संपादक महोदय के चरित्र के हवाले से-
“हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर,
वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
आत्म-शोध पर”
बस यही कविता उन संपादक महोदय का CV है!!
समय रहते बदल ली है केंचुल, महोदय अब बुद्धिजीवी हैं!!
समाचार ‘फ़िलहाल’ के लिए समाप्त।





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