श्रवण विश्वकर्मा और शंख एयर (Shankh Air) की कहानी आज के दौर में उद्यमशीलता (Entrepreneurship) का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्नाव की धूल भरी सड़कों से शुरू हुआ यह सफर अब बादलों को छूने के लिए तैयार है।
शंख एयर: टेंपो लोडर से एयरलाइन मालिक तक का अविश्वसनीय सफर
1. शुरुआती संघर्ष: जमीन से जुड़ी जद्दोजहद
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के एक साधारण परिवार में जन्मे श्रवण विश्वकर्मा की कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म जैसी लगती है। शिक्षा केवल दसवीं तक हुई, लेकिन संघर्ष की पाठशाला बहुत बड़ी थी। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि उन्हें शुरू में टेंपो पर लोडर का काम करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने खुद टेंपो चलाया और फिर टेंट हाउस जैसे छोटे व्यवसायों में हाथ आजमाया। शुरुआती नाकामियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि बाजार की रग-रग से वाकिफ कराया।
2. सफलता की सीढ़ी: ट्रांसपोर्ट से एयरलाइंस तक
श्रवण जी की किस्मत का पहिया 2014 के आसपास घूमना शुरू हुआ।
सीमेंट ट्रेडिंग: उन्होंने सीमेंट के कारोबार में कदम रखा और मुनाफा कमाया।
लॉजिस्टिक्स का साम्राज्य: उसी मुनाफे को उन्होंने ट्रांसपोर्ट सेक्टर में निवेश किया। आज उनके पास 400 से अधिक ट्रकों का बेड़ा है, जो उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों में माल ढुलाई का एक बड़ा नेटवर्क संभालता है।
हवाई सफर का सपना: जब सड़कें छोटी लगने लगीं, तो उन्होंने आसमान की ओर रुख किया और Shankh Air की नींव रखी।
3. शंख एयर (Shankh Air) की खास बातें
भारत सरकार और नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त करने के बाद, शंख एयर उत्तर प्रदेश की पहली निजी एयरलाइन बनने की राह पर है।
मुख्य केंद्र (Base): इसका मुख्य बेस नोएडा जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट होगा। जब तक जेवर चालू नहीं होता, तब तक संचालन दिल्ली (IGI) से होगा।
विमानों का बेड़ा: एयरलाइन ने शुरुआत के लिए Airbus A320neo विमानों को चुना है, जो अपनी ईंधन दक्षता और लंबी दूरी के लिए जाने जाते हैं।
रूट और नेटवर्क: कंपनी का मुख्य फोकस टियर-2 और टियर-3 शहरों पर है। यह लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी और कानपुर जैसे शहरों को देश के अन्य महानगरों से सीधे जोड़ेगी।
प्रीमियम सर्विस: शंख एयर का लक्ष्य कम लागत में बेहतर अनुभव प्रदान करना है, जिसमें ‘फुल सर्विस’ और ‘किफायती’ का मेल होगा।
4. यह कहानी प्रेरणा क्यों है?
आज के दौर में जहाँ स्टार्टअप्स के लिए बड़ी डिग्रियां (IIT/IIM) अनिवार्य मानी जाती हैं, वहाँ श्रवण विश्वकर्मा ने साबित किया कि:
जमीनी अनुभव: धंधे की असली समझ किताबों से नहीं, ग्राहकों और सड़कों से आती है।
दृढ़ संकल्प: एक टेंपो चालक का एयरलाइन मालिक बनने का सपना देखना ही अपने आप में क्रांतिकारी था।
स्थानीय कनेक्ट: उन्होंने अपने व्यापार का केंद्र उत्तर प्रदेश को रखा, जिससे क्षेत्रीय विकास और रोजगार को बढ़ावा मिले।
निष्कर्ष: “उड़ने की कोई सीमा नहीं”
श्रवण विश्वकर्मा की यह ‘Zero to Hero’ यात्रा बताती है कि छोटे शहर के लड़कों के सपने केवल डॉक्टर या इंजीनियर बनने तक सीमित नहीं होने चाहिए। अगर लक्ष्य बड़ा हो और मेहनत सच्ची, तो एक साधारण लोडर भी देश के उड्डयन मानचित्र (Aviation Map) पर अपना नाम दर्ज करा सकता है।
सोशल मीडिया के लिए एक टैगलाइन: जो कल तक उन्नाव की सड़कों पर टेंपो मोड़ते थे, वो आज बादलों का रास्ता मोड़ने की तैयारी में हैं। सलाम है श्रवण विश्वकर्मा की इस ‘उड़ान’ को!





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