नई दिल्ली: डिजिटल मीडिया के दौर में पत्रकारिता की सीमाएं कहाँ खत्म होती हैं और सामाजिक नैतिकता कहाँ शुरू होती है, इसे लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में न्यूज़ पोर्टल ‘द लल्लनटॉप’ (The Lallantop) द्वारा साझा किए गए एक वीडियो क्लिप ने सोशल मीडिया पर बवाल खड़ा कर दिया है, जिसमें महिलाओं की वर्जिनिटी, वजाइना और G-Spot जैसे बेहद निजी विषयों पर खुलकर चर्चा की गई है।
क्या है पूरा मामला?
’द लल्लनटॉप’ ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर ‘सेहत’ शो का एक 47 सेकंड का वीडियो साझा किया। इस वीडियो में डॉ. तनुश्री महिलाओं के यौन सुख (Sexual Pleasure), शरीर की बनावट और वर्जिनिटी से जुड़े मिथकों के इर्द-गिर्द वैज्ञानिक जानकारी दे रही हैं। ट्वीट के कैप्शन में बताया गया कि महिलाओं को सबसे ज्यादा सुख कब मिलता है और G-Spot की स्थिति क्या होती है।
अभिषेक उपाध्याय की कड़ी प्रतिक्रिया: “पत्रकारिता को कर दिया टॉपलेस”
इस वीडियो के वायरल होने के बाद वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने लल्लनटॉप की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसे पत्रकारिता के गिरते स्तर का प्रतीक बताते हुए कहा कि ऐसे कंटेंट से पत्रकारिता की मर्यादा को ‘टॉपलेस’ कर दिया गया है।
अभिषेक उपाध्याय ने अपनी टिप्पणी में गंभीर सवाल खड़े किए:
”वजाइना में यहां होता है G-Spot.. Sexual Pleasure के साथ-साथ जानकारी दी जा रही है। मोबाइल चलाने वाले नाबालिग इसे देखते हुए अपनी कल्पनाओं को ‘एपस्टीन फाइल्स’ सरीखा पंख दे सकते हैं।”
विवाद के मुख्य बिंदु: ‘जागरूकता या व्यूज का खेल?’
इस रिपोर्ट ने इंटरनेट जगत को दो हिस्सों में बाँट दिया है:
वर्जिनिटी और टैबू: एक पक्ष का मानना है कि भारत में महिलाओं की वर्जिनिटी (Virginity) को लेकर समाज में कई गलत धारणाएं हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन पर बात करना महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों के लिए जरूरी है।
सार्वजनिक पहुंच का खतरा: अभिषेक उपाध्याय का तर्क है कि चूंकि यह कंटेंट ओपन प्लेटफॉर्म पर है, इसे 8 साल के बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक देख रहे हैं। बिना किसी ‘एज-फिल्टर’ के ऐसी जानकारी परोसना नाबालिगों के लिए अनुचित हो सकता है।
पत्रकारिता के मापदंड: क्या मुख्यधारा की पत्रकारिता को महिलाओं के सबसे निजी अंगों और अनुभवों को ‘न्यूज हेडलाइन’ बनाना चाहिए? आलोचकों के अनुसार, यह पत्रकारिता नहीं बल्कि ‘क्लिकबेट’ (Clickbait) संस्कृति का हिस्सा है।
निष्कर्ष
यह विवाद असल में ‘सेक्स एजुकेशन’ बनाम ‘सामाजिक शालीनता’ की पुरानी बहस का नया मोड़ है। जहाँ लल्लनटॉप इसे वैज्ञानिक जागरूकता का नाम दे रहा है, वहीं वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय इसे नैतिक पतन और पत्रकारिता के गिरते स्तर के रूप में देख रहे हैं।





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