Home » टीवी » चुनावी मानसून आते ही बरसाती मेंढ़क रूपी चैनल टर्राने लगे हैं,“आजतक” से भी बड़ा चैनल खोलना है

चुनावी मानसून आते ही बरसाती मेंढ़क रूपी चैनल टर्राने लगे हैं,“आजतक” से भी बड़ा चैनल खोलना है

63 Views

वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार पाठक जी का यह संस्मरण मीडिया इंडस्ट्री के एक बहुत ही कड़वे, व्यावहारिक और वास्तविक चेहरे को उजागर करता है। आज के समय में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर टीवी चैनल शुरू करने के नाम पर जो ‘तमाशा’ चल रहा है, यह संवाद उस पर एक सटीक कटाक्ष है।

​इस पूरे घटनाक्रम और बातचीत के मुख्य बिंदुओं का विश्लेषण कुछ इस तरह किया जा सकता है:

​1. ‘आज तक से बड़ा चैनल’ और जमीनी हकीकत का अंतर

​मीडिया सेक्टर में आने वाले नए व्यापारियों (विशेषकर रीयल एस्टेट, चिटफंड या अन्य धंधों से आने वाले) में एक अजीब सा मुगालता होता है। वे करोड़ों-अरबों के बजट वाले स्थापित चैनलों (जैसे आज तक) से मुकाबला करने का सपना तो देखते हैं, लेकिन उन्हें ब्रॉडकास्टिंग, कैरिज फीस (Placement Cost), डिस्ट्रीब्यूशन और तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर की बुनियादी लागत का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं होता।

​2. चुनाव और ‘ब्लैक मनी’ को खपाने का जरिया

​व्यापारी का उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनावों पर बार-बार जोर देना यह साफ करता है कि उसका मकसद कोई गंभीर पत्रकारिता या ‘समाज को कुछ लौटाना’ नहीं था। चुनाव के वक्त रीजनल चैनलों में आने वाले विज्ञापन और अन्य ‘मैनेजमेंट’ के खेल के जरिए वह निवेश को भुनाना चाहता था।

​3. ‘समाचार प्लस’ के खाली स्पेस को पहचानना

​संतोष पाठक जी ने बातचीत में एक बेहद सटीक और व्यावहारिक बात कही—“समाचार प्लस के बंद होने के बाद यूपी/उत्तराखंड में उस जैसे चैनल की जगह खाली है।” यह इस बात का प्रमाण है कि उन्हें क्षेत्रीय मीडिया मार्केट की गहरी समझ है। वो हवा-हवाई बातें करने के बजाय जानते हैं कि स्थापित ब्रांड्स के बीच में कहां जगह बनाई जा सकती है, लेकिन उसके लिए भी तीन गुना फंड की जरूरत होगी।

​4. पेशेवर और दलाल पत्रकारों का अंतर

​इस इंडस्ट्री में दो तरह के लोग हैं:

  • ​एक वो, जो नए नवेले मालिकों को बड़े-बड़े सपने दिखाकर ‘परचेज’ (इक्विपमेंट खरीद) और कैरिज डील में अपनी दलाली (कमीशन) कूटते हैं, चैनल का कबाड़ा करते हैं और 6 महीने में भाग जाते हैं।
  • ​दूसरे संतोष पाठक जैसे पेशेवर लोग, जो सीधे तौर पर मालिक की औकात और नीयत को नाप लेते हैं।

​5. सुरक्षा कवच और ‘कंसल्टिंग फीस’ का दांव

​एक मंझे हुए पत्रकार की तरह उन्होंने व्यापारी के सामने जो शर्तें रखीं, वे बेहतरीन थीं:

    • कर्मचारियों के लिए डेढ़ साल और खुद के लिए 6 महीने का एडवांस वेतन: नए मीडिया मालिकों की सबसे खराब आदत होती है कि चैनल शुरू होने के कुछ महीनों बाद ही वे सैलरी रोकना शुरू कर देते हैं। यह शर्त उस व्यापारी की वित्तीय गंभीरता को परखने के लिए लिटमस टेस्ट थी।
    • प्लानिंग के लिए ₹1,00,000 की कंसल्टिंग फीस: जब व्यापारी केवल मुफ्त में आइडिया और ‘प्लान’ चुराने की कोशिश कर रहा था, तो पाठक जी ने तुरंत अपनी बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) की कीमत लगा दी। इससे सामने वाले की हवा निकल गई।

निष्कर्ष:

यह संस्मरण नोएडा और दिल्ली के होटलों में रोज होने वाली उन तथाकथित ‘गोपनीय बैठकों’ का आईना है, जहां पूंजीपति मीडिया की ताकत का इस्तेमाल अपने रसूख के लिए करना चाहते हैं, लेकिन अंत में एक प्रोफेशनल की कड़क शर्तों के आगे वे बगलें झांकने लगते हैं। पाठक जी ने अंत में जो कहा कि “चैनल खोलना और चलाना मज़ाक नहीं है, महाराज”, वही इस पूरी इंडस्ट्री का कड़वा सच है।

media4samachar
Author: media4samachar

Live Cricket

Daily Astrology