बरेली | 4 अगस्त 2026: बरेली में पुलिस और मीडिया के बीच हुआ विवाद अब कानूनी रूप ले चुका है। पुलिस लाइन सभागार में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वरिष्ठ पत्रकार मयूर तलवार के साथ हुए कथित अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ दायर रिट याचिका अब इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो गई है। इस कदम के बाद से पुलिस महकमे और मीडिया हलकों में हलचल तेज़ हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
घटना 4 मई 2026 की है, जब बरेली पुलिस लाइन सभागार में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी। याचिका के अनुसार, वार्ता के दौरान SP सिटी मनुष पारिख ने अन्य सभी पत्रकारों की मौजूदगी में वरिष्ठ पत्रकार मयूर तलवार को कॉन्फ्रेंस से बाहर जाने को कहा।
जब पत्रकार ने इसका विरोध जताया, तो आरोप है कि SP सिटी ने उन्हें सार्वजनिक रूप से “Get Out” कहकर बाहर निकाल दिया। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस घटना से उनकी पेशेवर गरिमा, आत्मसम्मान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गहरी ठेस पहुँची है।
प्रशासनिक शिथिलता के बाद हाईकोर्ट का रुख
घटना के ठीक अगले दिन, 5 मई 2026 को मयूर तलवार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को लिखित शिकायत दी थी।
- कार्रवाई न होने का आरोप: याचिका में कहा गया है कि सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने और लिखित शिकायत सौंपने के बावजूद ज़िम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई प्रभावी दंडात्मक या सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई।
- अंतिम विकल्प: स्थानीय स्तर पर न्याय न मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने न्याय की उम्मीद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।
इन अधिकारियों को बनाया गया पक्षकार (प्रतिवादी)
पत्रकार मयूर तलवार द्वारा दाखिल इस रिट याचिका में राज्य के शीर्ष प्रशासनिक व पुलिस तंत्र को घेरा गया है। याचिका में निम्नलिखित को प्रतिवादी बनाया गया है:
- उत्तर प्रदेश सरकार
- पुलिस महानिदेशक (DGP)
- जिला मजिस्ट्रेट (DM), बरेली
- पुलिस महानिरीक्षक (IG)
- वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), बरेली
- SP सिटी, मनुष पारिख (मुख्य आरोपी अधिकारी)
याचिका में की गई प्रमुख मांगें
याचिकाकर्ता ने माननीय अदालत से गुहार लगाते हुए मुख्य रूप से तीन बिंदु उठाए हैं:
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- निष्पक्ष जांच: 4 मई को हुई घटना की किसी स्वतंत्र एजेंसी या निष्पक्ष तंत्र से गहन जांच कराई जाए।
- जवाबदेही तय हो: दोषी अधिकारी के खिलाफ संवैधानिक व प्रशासनिक मर्यादाओं के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की जाए।
- संवैधानिक सुरक्षा: पत्रकारों की गरिमा, समान व्यवहार और भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
“यह मामला अब सिर्फ एक पत्रकार के व्यक्तिगत अपमान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (प्रेस) की स्वतंत्रता और प्रशासनिक तंत्र के मनमाने रवैये से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।”
आगे क्या?
इस मामले ने उत्तर प्रदेश में मीडिया की स्वतंत्रता और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर एक नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई और अदालत के रुख पर टिकी हैं। हाईकोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि सार्वजनिक आयोजनों में मीडिया की गरिमा और पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही की सीमाएँ क्या होंगी।





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