लखनऊ/वाराणसी। मीडिया में जल्दबाजी और तथ्य-जांच की कमी के कारण एक बड़ी संपादकीय चूक का मामला सामने आया है। दैनिक जागरण समूह के प्रमुख द्विभाषी अखबार ‘iNEXT’ ने राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य मदन मोहन पांडे से जुड़ी एक खबर में उनकी फोटो की जगह भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय की तस्वीर प्रकाशित कर दी। केवल नाम की समानता के आधार पर हुई इस गंभीर लापरवाही ने सोशल मीडिया और पत्रकारिता जगत में बहस छेड़ दी है।

नाम की समानता बनी चूक की वजह
यह मामला तब तूल पकड़ गया जब पाठकों ने अखबार में छपी फोटो पर ध्यान दिया। खबर राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य और प्रमुख कानूनी विशेषज्ञ मदन मोहन पांडे से संबंधित थी। लेकिन फोटो सर्च और डेस्क एडिटिंग के दौरान नाम की समानता के कारण देश के महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय की तस्वीर लगा दी गई।
पत्रकारिता की बुनियादी प्रक्रिया पर उठे सवाल
इस घटना ने एक बार फिर समाचार पत्रों में गेटकीपिंग (तथ्य-जांच की प्रक्रिया) की विफलता को उजागर किया है। एक प्रमुख और ऐतिहासिक व्यक्तित्व की तस्वीर को न पहचान पाना और बिना सत्यापन के उसे लेआउट में लगा देना संपादकीय लापरवाही की पराकाष्ठा माना जा रहा है।
इस घटना से जुड़े प्रमुख तकनीकी व संपादकीय पहलू:
- सर्च इंजन पर अत्यधिक निर्भरता: डिजिटल दौर में फोटो आर्काइव से सही तस्वीर निकालने के बजाय इंटरनेट पर नाम सर्च करके पहली उपलब्ध फोटो का इस्तेमाल करना इस तरह की गलतियों की मुख्य वजह है।
- उप-संपादक (Sub-Editor) की सतर्कता: पेज पर खबर लगाने वाले सब-एडिटर ने न तो चेहरे का मिलान किया और न ही व्यक्ति की पृष्ठभूमि का ध्यान रखा।
- चीफ एडिटर और पेज इन-चार्ज की अनदेखी: पेज को प्रिंटिंग प्रेस भेजने से पहले समीक्षा (Proofing) करने वाले वरिष्ठ संपादकों की नजरों से भी यह बड़ी चूक निकल गई।
साख और विश्वसनीयता पर असर
पत्रकारिता में खबरों की सटीकता के साथ-साथ सही दृश्य सामग्री (Visual Content) का इस्तेमाल अत्यंत संवेदनशील विषय होता है। पंडित मदन मोहन मालवीय देश के अत्यंत आदरणीय भारत रत्न हैं, वहीं मदन मोहन पांडे वर्तमान समय की एक जीवित और सक्रिय शख्सियत हैं। दो बिल्कुल अलग दौर और पृष्ठभूमि के व्यक्तियों में अंतर न कर पाना मीडिया हाउस के क्रेडिबिलिटी और फैक्ट-चेकिंग मैकेनिज्म पर गहरा दाग लगाता है।
प्रिंट मीडिया में छपी गलती को डिजिटल मीडिया की तरह तुरंत सुधारा भी नहीं जा सकता, इसलिए यह मामला केवल एक छोटी सी ‘प्रिंटिंग एरर’ न होकर संस्थान के संपादकीय स्तर पर गंभीर आत्ममंथन का विषय बन गया है।


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