भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बिहार इकाई और एक प्रमुख महिला टीवी पत्रकार के बीच सोशल मीडिया पर जारी जुबानी जंग ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। यह विवाद पत्रकारिता की निष्पक्षता और राजनीतिक दलों के मीडिया के प्रति बढ़ते आक्रामक रुख को फिर से चर्चा में ले आया है।
विवाद की मुख्य वजह
इस पूरे विवाद की जड़ एक सोशल मीडिया पोस्ट है। मिली जानकारी के अनुसार, एंकर ने एक विश्वविद्यालय (संभवतः AMU) से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की थी। बिहार कांग्रेस ने इस पर आपत्ति जताते हुए एंकर को “कंप्रोमाइज्ड एंकर” (समझौतावादी एंकर) कहा।
कांग्रेस का आरोप है कि:
- एंकर का नजरिया एकपक्षीय है और वह एक खास राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा दे रही हैं।
- विवादित टिप्पणी करने के बाद उसे हटाना (Delete करना) उनकी असुरक्षा और गलती को दर्शाता है।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं का सैलाब
इस पोस्ट के बाद इंटरनेट जगत दो धड़ों में बंट गया है:
- कांग्रेस समर्थक: इनका तर्क है कि मुख्यधारा की मीडिया के कुछ चेहरे अपनी तटस्थता खो चुके हैं और सत्ता पक्ष के प्रवक्ता के रूप में कार्य कर रहे हैं, इसलिए उन्हें आईना दिखाना जरूरी है।
- मीडिया के समर्थक: कई पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि किसी महिला पत्रकार के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करना न केवल अभद्र है, बल्कि यह प्रेस की आजादी को दबाने की कोशिश है।
निष्कर्ष
फिलहाल संबंधित एंकर ने इस “टैग” पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की है, लेकिन बिहार कांग्रेस के इस कड़े रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में मीडिया और विपक्षी दलों के बीच यह तनाव और बढ़ सकता है।
महत्वपूर्ण बिंदु: राजनीतिक दलों द्वारा पत्रकारों को ‘ब्लैकलिस्ट’ करना या उन्हें विशेष उपनामों से संबोधित करना भारतीय लोकतंत्र में एक नई और जटिल चुनौती बनता जा रहा है।



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