प्रयागराज / बरेली उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद में पत्रकार मयूर तलवार के खिलाफ दर्ज हुए गंभीर मुकदमों के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर असंतोष व्यक्त करते हुए बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), एसपी सिटी मानुष पारिख और थाना प्रेमनगर के प्रभारियों को जवाबदेही के लिए तलब किया है।

सत्ता और पुलिस के गठजोड़ पर गंभीर आरोप
याचिकाकर्ता मयूर तलवार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्रिमिनल मिस. रिट पिटिशन संख्या 15363/2025 दाखिल कर अपनी सुरक्षा और निष्पक्ष जांच की गुहार लगाई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि:

- फर्जी मुकदमे: थाना प्रेमनगर में उन पर अपराध संख्या 260/25 के तहत लूट और हत्या के प्रयास जैसे जघन्य आरोपों में मामला दर्ज किया गया है, जो पूरी तरह निराधार है।
- संपत्ति विवाद का दबाव: पत्रकार का दावा है कि एक स्थानीय संपत्ति विवाद में उन्हें झुकाने के लिए पुलिस का दुरुपयोग किया जा रहा है।
- फायरिंग की साजिश: उन पर दबाव बनाने के लिए फर्जी फायरिंग की घटनाओं का ताना-बाना बुना गया।
कोर्ट की फटकार: “अब और देरी बर्दाश्त नहीं”
मामले की सुनवाई के दौरान माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारियों को कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए, न कि किसी पक्ष विशेष के दबाव में।
न्यायालय के मुख्य निर्देश:
- अंतिम अवसर: सरकार और पुलिस प्रशासन को जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अंतिम समय दिया गया है।
- अधिकारियों की पेशी: कोर्ट ने स्पष्ट रूप से एसपी सिटी बरेली और अन्य संबंधित थाना प्रभारियों की भूमिका पर जवाब मांगा है।
- अगली तिथि: मामले की अगली सुनवाई के लिए 29 अप्रैल 2026 की तारीख मुकर्रर की गई है।
प्रशासनिक खेमे में मची खलबली
हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद बरेली पुलिस महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। विशेष रूप से एसपी सिटी मानुष पारिख की भूमिका अब अदालत की रडार पर है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पुलिस दो सप्ताह के भीतर ठोस साक्ष्य और संतोषजनक जवाब पेश नहीं कर पाती है, तो संबंधित अधिकारियों पर गाज गिर सकती है।
अभिव्यक्ति की आजादी और पुलिस की साख
यह प्रकरण अब केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसे उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के उत्पीड़न और पुलिसिया बर्बरता के उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। पत्रकार संगठनों ने भी इस मामले में मयूर तलवार का समर्थन करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग तेज कर दी है।
निष्कर्ष: अब सबकी नजरें 29 अप्रैल को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। क्या बरेली पुलिस अपनी कार्रवाई को जायज ठहरा पाएगी या फिर कोर्ट की नाराजगी अधिकारियों पर भारी पड़ेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।



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