नई दिल्ली/मेरठ: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का काम सत्ता और प्रशासन से तीखे सवाल पूछना है, लेकिन जब सवाल पूछने का जरिया व्यक्तिगत हमले और अभद्र भाषा बन जाए, तो पत्रकारिता की साख पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। हाल ही में एबीपी न्यूज की एंकर चित्रा त्रिपाठी द्वारा मेरठ के एसएसपी अविनाश पांडे के खिलाफ लाइव टीवी पर की गई टिप्पणी ने एक बार फिर मीडिया की कार्यशैली और उसकी भाषाई मर्यादा को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
लाइव डिबेट के दौरान एंकर चित्रा त्रिपाठी ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए मेरठ के एसएसपी अविनाश पांडे को न सिर्फ मुंह से बार-बार ‘वर्दी वाला गुंडा’ कहा, बल्कि स्क्रीन पर भी बड़े-बड़े अक्षरों में इस आपत्तिजनक टैगलाइन को फ्लैश किया गया। एक जिम्मेदार संवैधानिक पद पर बैठे आईपीएस अधिकारी के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करना अब सोशल मीडिया से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग के बीच तीखी आलोचना का विषय बन गया है।
सवाल पूछने और फैसला सुनाने में फर्क भूले एंकर
यह कोई पहला मौका नहीं है जब टीवी पत्रकारिता में इस तरह की उग्रता देखी गई हो, लेकिन एक जिले के कप्तान को सीधे ‘गुंडा’ कह देना पत्रकारिता के तय मानकों (Ethics) का सीधा उल्लंघन है। जानकारों का कहना है कि पुलिस या प्रशासन की कार्यशैली, उनके फैसलों या उनकी किसी कार्रवाई पर तीखे से तीखा सवाल उठाना मीडिया का अधिकार है। लेकिन लाइव टीवी पर खुद ही जज (न्यायाधीश) बनकर किसी को ‘गुंडा’ घोषित कर देना सिर्फ और सिर्फ टीआरपी बटोरने का एक सस्ता हथकंडा नजर आता है।
चौतरफा घिरीं चित्रा त्रिपाठी: सोशल मीडिया पर उठ रहे सवाल
इस प्रस्तुति के बाद दर्शक और मीडिया विश्लेषक लगातार एंकर की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। लोगों का कहना है कि जो मीडिया पुलिस को एक दायरे और सीमा में रहकर काम करने की नसीहत देता है, वही मीडिया खुद अपनी सीमाएं क्यों लांघ रहा है?
एक वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा: “आज की टीवी पत्रकारिता ‘लाउड और सेंसेशनल’ हो चुकी है। शांत और तथ्यों पर आधारित बातचीत को अब बोरिंग मान लिया गया है। जब तक स्क्रीन पर ड्रामा, चिल्लाहट और गाली-गलौज जैसे शब्द न हों, तब तक दर्शकों को बांधे रखने की चुनौती होती है। चित्रा त्रिपाठी ने जो किया, वह पत्रकारिता नहीं बल्कि सीधे तौर पर एक अधिकारी का चरित्र हनन (Character Assassination) है।”
हर तरफ लांघी जा रही हैं सीमाएं
इस घटना ने समाज के उस कड़वे सच को भी उजागर किया है जहाँ चाहे नेता हों, पुलिस हो, जनता हो या फिर खुद मीडिया—हर कोई अपनी मर्यादा भूलता जा रहा है। कोई भी अपने सामने किसी दूसरे के पद, गरिमा और अधिकारों को समझने को तैयार नहीं है।
अगर पुलिस से एक जिम्मेदार और मानवीय व्यवहार की अपेक्षा है, तो देश के बड़े न्यूज चैनलों पर बैठने वाले एंकरों से भी यह उम्मीद की जाती है कि वे भाषा की गरिमा बनाए रखें। बहरहाल, इस पूरे मामले के बाद एबीपी न्यूज और चित्रा त्रिपाठी की इस कार्यशैली की हर तरफ निंदा हो रही है और निष्पक्ष पत्रकारिता की दुहाई देने वाले चैनलों के दोहरे मापदंड एक बार फिर बेनकाब हो गए हैं।





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