इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आपसी सहमति से बने संबंधों (Consensual Relationships) और शादी के वादे को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बालिगों के बीच आपसी रजामंदी से बने शारीरिक संबंधों को बाद में शादी न हो पाने की स्थिति में ‘दुष्कर्म’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि “शादी का झूठा वादा करना और परिस्थितियों के कारण शादी का टूट जाना, दोनों पूरी तरह से अलग-अलग बातें हैं।”
इस टिप्पणी के साथ ही न्यायमूर्ति मदनपाल सिंह की एकल पीठ ने मुरादाबाद की निचली अदालत द्वारा आरोपी के खिलाफ जारी समन और आपराधिक कार्रवाई के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता (प्रेमी) और पीड़िता लंबे समय से एक-दूसरे के साथ रिश्ते में थे और उनके बीच आपसी सहमति से शारीरिक संबंध भी बने थे। बाद में दोनों के बीच मतभेद होने के कारण शादी नहीं हो सकी।
इसके बाद पीड़िता ने निचली अदालत में प्रेमी और उसके परिवार के एक अन्य सदस्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया, जिसमें दुष्कर्म और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल (SC/ST एक्ट के तहत) के आरोप लगाए गए थे। निचली अदालत ने आरोपों का संज्ञान लेते हुए आरोपी के खिलाफ समन जारी कर पुलिस को कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए थे। निचली अदालत के इसी फैसले को आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और कानूनी व्याख्या
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति मदनपाल सिंह की पीठ ने कानून और परिस्थितियों का बारीकी से विश्लेषण किया और निम्नलिखित मुख्य बिंदु तय किए:
1. शुरुआती मंशा (Intent) ही सबसे मुख्य आधार
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी मामले को ‘शादी के झूठे वादे पर दुष्कर्म’ तब माना जाएगा, जब यह साबित हो कि आरोपी की नीयत शुरुआत से ही खोटी थी। यानी उसका उद्देश्य कभी शादी करना था ही नहीं, बल्कि उसने सिर्फ शारीरिक संबंध बनाने के लिए शादी का झूठा नाटक रचा था।





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