यूपी के डीजीपी को जारी किए गए सख्त निर्देश; BNSS की धारा-180 के तहत पारदर्शिता बढ़ाने और निष्पक्ष जांच पर दिया गया जोर
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आपराधिक मामलों की पुलिस जांच प्रक्रिया को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस अब गवाहों के बयानों को मनगढ़ंत तरीके से या अपनी सुविधानुसार दर्ज नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि गवाह जिस भाषा और जिन शब्दों में अपनी बात कहे, उसका बयान ठीक उसी रूप में दर्ज किया जाए।
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को इस संबंध में प्रदेश के सभी जांच अधिकारियों के लिए सख्त दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी करने के निर्देश दिए हैं, ताकि जांच में पारदर्शिता लाई जा सके।
BNSS की धारा-180 का कड़ाई से पालन करने का आदेश
सुनवाई के दौरान अदालत ने ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) की धारा-180 का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि गवाहों की गवाही लेते समय कानून के तय प्रावधानों का शत-प्रतिशत पालन होना चाहिए।
हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणी:
“न्याय प्रणाली का मूल उद्देश्य केवल दोषियों को सजा दिलाना ही नहीं, बल्कि निर्दोषों के अधिकारों की रक्षा करना भी है। यदि जांच की शुरुआत ही दोषपूर्ण या पक्षपातपूर्ण बयानों से होगी, तो न्याय की अवधारणा ही समाप्त हो जाएगी।”
प्रमुख बिंदु: फैसले की बड़ी बातें
- गवाह के अपने शब्द: पुलिस अधिकारी बयान में अपनी तरफ से न तो कोई नई बात जोड़ सकते हैं और न ही किसी तथ्य को हटा सकते हैं।
- भ्रामक सवालों पर रोक: पूछताछ के दौरान गवाहों से ऐसे पेचीदा, भ्रामक या दबाव बनाने वाले सवाल पूछने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है, जिनसे वे भ्रमित हों।
- मातृभाषा/स्थानीय भाषा में दर्ज हो बयान: गवाह जिस भाषा (हिंदी, अवधी, भोजपुरी या अन्य स्थानीय बोली) में सहज हो, उसके बयान का मूल भाव उसी रूप में रिकॉर्ड पर लाया जाए।
- जांच अधिकारियों की जवाबदेही: डीजीपी को निर्देश दिया गया है कि वे राज्य के सभी थानों और जांच एजेंसियों को सर्कुलर जारी कर इन नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की चेतावनी दें।
निष्पक्ष न्याय प्रणाली की ओर बड़ा कदम
अक्सर अदालतों में यह देखने को मिलता है कि पुलिस जांच के दौरान अपने हिसाब से बयान तैयार कर लेती है, जिससे मुकदमे के ट्रायल (सुनवाई) के दौरान गवाह अपने बयान से पलट जाते हैं या मुकर (hostile) जाते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश से न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार आएगा, बल्कि निर्दोष लोगों को फर्जी मुकदमों में फंसाए जाने की आशंका भी काफी हद तक खत्म होगी।
डीजीपी कार्यालय को जल्द ही इन निर्देशों के तहत राज्यभर के पुलिस अधिकारियों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करने के लिए कहा गया है।





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