मीडिया संस्थानों में कर्मचारियों के उत्पीड़न और श्रम अधिकारों के हनन के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। ताजा मामला ‘अमृत विचार’ अखबार से सामने आया है, जहाँ भविष्य निधि (PF) के पैसों की गड़बड़ी को लेकर उठा विवाद अब बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। संस्थान के पूर्व कर्मचारी मनोज चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए दावा किया है कि अपने हक की आवाज उठाने पर उन्हें लगातार डराया-धमकाया जा रहा है और ‘जान से मारने’ तक की धमकी दी जा रही है।
मनोज चतुर्वेदी की इस पोस्ट के बाद मीडिया गलियारों से लेकर प्रशासनिक महकमे तक में हड़कंप मच गया है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पीड़ित ने गोंडा पुलिस और लखनऊ पुलिस को भी टैग कर मामले में तुरंत हस्तक्षेप और सुरक्षा की गुहार लगाई है।
“कुछ भी हुआ तो जिम्मेदार होंगे पार्थ कुनार”
मनोज चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से अपनी जान का खतरा जताया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि यदि उनके साथ भविष्य में कोई भी अप्रिय घटना, दुर्घटना या अनहोनी होती है, तो उसकी पूरी और सीधी जिम्मेदारी पार्थ कुनार की होगी।
चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि पीएफ के पैसे के भुगतान की मांग करने पर उन्हें कथित तौर पर “जान से मरवा देने” की धमकी दी गई है। एक पत्रकार/मीडिया कर्मी द्वारा सुरक्षा को लेकर इस तरह सरेआम गुहार लगाना कानून-व्यवस्था और मीडिया घरानों के आंतरिक माहौल पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
हक मांगने पर मुकदमा दर्ज कराने की धौंस!
सोशल मीडिया पर साझा किए गए स्क्रीनशॉट और दस्तावेजों के हवाले से पूर्व कर्मचारी ने आरोप लगाया है कि संस्थान द्वारा कर्मचारियों के पीएफ का पैसा लंबे समय तक जमा नहीं किया गया, जो कि सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता और श्रम कानूनों का उल्लंघन है।
आरोप है कि जब मनोज ने इस संबंध में दोबारा प्रबंधन या संबंधित पक्ष से संपर्क साधा, तो उन्हें राहत देने के बजाय डराया गया। उन्हें कथित तौर पर कहा गया— “दोबारा कॉल मत करना, वरना तुम्हारे खिलाफ मुकदमा लिखवा दूंगा।” कर्मचारियों के जायज हितों और मेहनत की कमाई को दबाने के लिए इस तरह के प्रशासनिक और कानूनी दबाव का हथकंडा अपनाए जाने के आरोपों ने अब तूल पकड़ लिया है।
श्रम अधिकार और कानूनी विशेषज्ञों का क्या है कहना?
इस पूरे प्रकरण पर कानूनी और श्रम मामलों के विशेषज्ञों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कानूनविदों का कहना है कि:
”देश के श्रम कानूनों के तहत किसी भी कर्मचारी को अपने वेतन, बोनस, भविष्य निधि (PF) या ग्रेच्युटी से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाने, जानकारी मांगने और कानूनी लड़ाई लड़ने का पूरा अधिकार है। यदि कोई नियोक्ता या अधिकारी इसके बदले कर्मचारी को धमकी देता है, दबाव बनाता है या डराता है, तो यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) और श्रम कानूनों के तहत एक गंभीर संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) है। पुलिस को ऐसे मामलों में तुरंत जांच करनी चाहिए।”
संबंधित पक्ष और पुलिस का रुख (Disclaimer)
- पुष्टि का अभाव: ‘Media4samachar’ सोशल मीडिया पर लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है।
- जवाब का इंतजार: इस पूरे घटनाक्रम और गंभीर आरोपों पर अमृत विचार प्रबंधन या नामजद पक्ष की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
- पुलिस की चुप्पी: गोंडा और लखनऊ पुलिस की तरफ से भी इस वायरल पोस्ट पर अब तक कोई औपचारिक एफआईआर या आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। संबंधित पक्षों का जो भी पक्ष सामने आएगा, उसे भी प्रमुखता से स्थान दिया जाएगा।
मीडिया जगत में सुलगते सवाल
यह मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और श्रम संगठनों ने ‘अमृत विचार’ प्रबंधन को कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जो मीडिया संस्थान समाज को न्याय दिलाने का दावा करते हैं, उनके अपने ही भीतर श्रम अधिकारों का इस कदर मखौल क्यों उड़ाया जा रहा है? क्या कॉरपोरेट दबाव के आगे कर्मचारियों की सुरक्षा और उनका हक इसी तरह दांव पर लगा रहेगा?



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