नई दिल्ली | सोमवार, 16 मार्च 2026
दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने सोमवार को न्यायिक आदेशों की लगातार अवहेलना करने पर उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। अदालत ने ग्रेटर नोएडा के बीटा-2 पुलिस स्टेशन के अधिकारियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिया है। यह कदम तब उठाया गया जब पुलिस अधिकारी बार-बार समन, जमानती वारंट और कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पेश होने में विफल रहे।
मामले की पृष्ठभूमि: जानलेवा हमला और एसिड अटैक
यह मामला 14 नवंबर 2018 का है, जब भारत एक्सप्रेस चैनल में कार्यरत महिला पत्रकार मिताली चंदोला पर जानलेवा हमला हुआ था। दर्ज FIR के अनुसार, उन पर न केवल गोलियां चलाई गईं, बल्कि उन पर एसिड भी फेंका गया था। मामले की भयावहता को देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने इस प्रकरण पर संज्ञान लिया था और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए केस को उत्तर प्रदेश से दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया था।
जांच में गंभीर खामियां और ‘फर्जी’ खेल
अदालत की समीक्षा के दौरान जांच अधिकारी (IO) सुंदर सिंह और बीटा-2 पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। अदालत ने पाया कि:
- अधूरी जांच: पुलिस ने फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट प्राप्त किए बिना ही जांच पूरी मान ली और फाइनल रिपोर्ट (FR) दाखिल कर दी।
- साक्ष्यों की अनदेखी: कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और अन्य तकनीकी साक्ष्यों को जानबूझकर रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया।
- फर्जी हलफनामा: याचिका में आरोप लगाया गया कि पुलिस ने एक कथित ‘फर्जी’ शपथपत्र के आधार पर केस बंद करने की कोशिश की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।
न्यायालय का सख्त संदेश
अदालत ने पूर्व में ही इस मामले में पुनः जांच (Re-investigation) के आदेश दिए थे। इसके बावजूद, गौतम बुद्ध नगर पुलिस की ओर से लगातार ढिलाई बरती गई। सोमवार को सुनवाई के दौरान जब कोई भी अधिकारी कोर्ट में हाजिर नहीं हुआ, तो अदालत ने इसे न्यायपालिका की अवमानना और आरोपियों को बचाने का प्रयास मानते हुए कड़ा रुख अपनाया।
“न्यायिक आदेशों की अनदेखी किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है। यदि पुलिस अधिकारी कानून का पालन नहीं करेंगे, तो अदालत को सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।” – पटियाला हाउस कोर्ट (टिप्पणी)
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की अदालत द्वारा उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ NBW जारी करना एक असाधारण कदम है। यह न केवल जांच एजेंसी की विफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि प्रभावशाली आरोपियों को बचाने की किसी भी कोशिश को अदालत बर्दाश्त नहीं करेगी






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