Home » टीवी » Zee मीडिया के चैनल हेड रहें वरिष्ठ पत्रकार आशीष दवे की बड़ी जीत: सुप्रीम कोर्ट ने माना—Zee ग्रुप ने रंजिश में दर्ज कराई थी ‘फर्जी’ FIR,देखें कोर्ट ऑर्डर कॉपी

Zee मीडिया के चैनल हेड रहें वरिष्ठ पत्रकार आशीष दवे की बड़ी जीत: सुप्रीम कोर्ट ने माना—Zee ग्रुप ने रंजिश में दर्ज कराई थी ‘फर्जी’ FIR,देखें कोर्ट ऑर्डर कॉपी

494 Views

मामले का संक्षिप्त विवरण

​यह कानूनी विवाद ज़ी मीडिया कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ZMCL) और उसके पूर्व चैनल हेड (राजस्थान और पश्चिम बंगाल) आशीष दवे के बीच संबंधों में आई कड़वाहट से उपजा है। कंपनी ने सितंबर 2025 में जयपुर के अशोक नगर पुलिस स्टेशन में आशीष दवे के खिलाफ एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत के आधार पर FIR संख्या 257/2025 दर्ज की गई, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं—308(2) (जबरन वसूली), 318(4) (धोखाधड़ी), और 351(2) (आपराधिक धमकी)—के तहत आरोप लगाए गए थे।

​शिकायत में लगाए गए आरोप

​कंपनी ने अपनी शिकायत में निम्नलिखित आरोप लगाए थे:
​आशीष दवे ने अपने वरिष्ठ पद का दुरुपयोग करते हुए बाहरी व्यवसायों के साथ अनैतिक और डराने वाले व्यवहार किए।
​उन्होंने विभिन्न विक्रेताओं और संस्थाओं से इस धमकी के साथ पैसे मांगे कि मांग पूरी न होने पर उनके खिलाफ नकारात्मक खबरें प्रसारित की जाएंगी।
​कंपनी का आरोप था कि दवे ने व्यक्तिगत लाभ के लिए कंपनी के प्लेटफॉर्म का उपयोग करके दुर्भावनापूर्ण तरीके से खबरें चलवाईं।
​कंपनी ने इन कृत्यों को अपनी प्रतिष्ठा और साख के लिए अपूरणीय क्षति बताया।

​सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियाँ और अवलोकन

​न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं:
​अस्पष्ट और काल्पनिक आरोप: अदालत ने पाया कि FIR पूरी तरह से “अस्पष्ट” और “काल्पनिक” कहानियों पर आधारित थी। शिकायत में न तो किसी विशेष पीड़ित का नाम था और न ही किसी ऐसी घटना का विवरण, जिससे किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का पता चले।
​पुलिस की भूमिका पर सवाल: कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि पुलिस ने बिना किसी प्रारंभिक जांच के, केवल एक प्रभावशाली मीडिया हाउस के कहने पर इतनी तेजी से FIR दर्ज कर ली। कोर्ट ने कहा कि यदि यही शिकायत कोई साधारण नागरिक लेकर आता, तो पुलिस शायद इसे दर्ज भी नहीं करती।
​सिविल बनाम क्रिमिनल विवाद: माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिकार का दुरुपयोग या अनैतिक व्यावसायिक व्यवहार सिविल लायबिलिटी (Civil Liability) का मामला हो सकता है, लेकिन इन्हें BNS के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
​प्रतिशोध की भावना: कोर्ट ने राय दी कि कंपनी ने संभवतः अपनी कानूनी देनदारियों से बचने या पूर्व कर्मचारी से हिसाब बराबर करने के लिए कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है。

BNSS 2023 की धारा 173(3) और प्रारंभिक जांच

​सुप्रीम कोर्ट ने नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173(3) के महत्व को रेखांकित किया:
​नया सुरक्षा कवच: यह धारा पुलिस को अधिकार देती है कि यदि अपराध की सजा 3 से 7 साल के बीच है, तो FIR दर्ज करने से पहले 14 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच की जा सकती है ताकि यह देखा जा सके कि मामला वास्तव में बनता है या नहीं।
​जरूरत: इस मामले में पुलिस को इस शक्ति का उपयोग करना चाहिए था, क्योंकि आरोप बेहद संदिग्ध और अस्पष्ट थे।

अंतिम निर्णय

​उच्चतम न्यायालय ने माना कि इस कार्यवाही को जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा। भजन लाल बनाम हरियाणा राज्य मामले में निर्धारित सिद्धांतों का पालन करते हुए, कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के पुराने आदेश को रद्द कर दिया और आशीष दवे के खिलाफ दर्ज FIR व सभी संबंधित कार्यवाहियों को क्वैश (निरस्त) कर दिया।

media4samachar
Author: media4samachar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Live Cricket

Daily Astrology