नई दिल्ली: रिलायंस एडीए ग्रुप (Reliance ADA Group) के चेयरमैन अनिल अंबानी द्वारा दायर एक मानहानि याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने टेलीविजन समाचार चैनल NDTV और उसके एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल को नोटिस जारी किया है। यह कानूनी कार्रवाई रिलायंस ग्रुप से जुड़ी केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच से संबंधित कवरेज के विरोध में की गई है।
न्यायालय की कार्यवाही और अगली तारीख
जस्टिस सुब्रमोनियम प्रसाद की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने अंबानी की उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें उन्होंने अंतरिम रोक (Interim Injunction) लगाने की मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल NDTV के खिलाफ कोई भी तत्काल अंतरिम आदेश या रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इस मामले की विस्तृत सुनवाई अब 18 जुलाई को निर्धारित की गई है।
अनिल अंबानी के आरोप: ’72 भ्रामक रिपोर्ट्स’
अपनी याचिका में अनिल अंबानी ने आरोप लगाया है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान NDTV ने उनके और उनकी कंपनियों के खिलाफ लगभग 72 रिपोर्ट्स प्रकाशित और प्रसारित की हैं। याचिका के अनुसार:
- इन रिपोर्ट्स का उद्देश्य कथित तौर पर उनकी व्यक्तिगत छवि और रिलायंस ग्रुप के व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचाना था।
- याचिकाकर्ता का दावा है कि कवरेज एकतरफा थी और उनके पक्ष को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया।
- अंबानी ने मांग की है कि ऐसी अपमानजनक सामग्री को डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाया जाए और भविष्य में ऐसी रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जाए।
हर्जाने की राशि और प्रतिवादी
अनिल अंबानी ने इस मानहानि के बदले ₹2 करोड़ से अधिक के हर्जाने (Damages) की मांग की है। विशेष रूप से, उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि यदि कोर्ट हर्जाने का आदेश देता है, तो वह पूरी राशि चैरिटी (दान) में देंगे। इस मामले में NDTV, उसकी मूल कंपनी, एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल और कुछ अन्य वरिष्ठ कर्मियों को प्रतिवादी बनाया गया है।
NDTV का रुख
फिलहाल इस कानूनी नोटिस पर NDTV या राहुल कंवल की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि 18 जुलाई को होने वाली सुनवाई में चैनल अपना पक्ष रखेगा, जहां प्रेस की स्वतंत्रता और रिपोर्टिंग के तथ्यों पर बहस होने की संभावना है।
मीडिया विश्लेषण:
यह मामला भारतीय मीडिया जगत में कॉरपोरेट बनाम प्रेस की स्वतंत्रता की बहस को एक बार फिर चर्चा में ले आया है। विशेष रूप से एक वरिष्ठ संपादक (राहुल कंवल) को व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी बनाया जाना इस कानूनी लड़ाई को और अधिक गंभीर बनाता है।




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