नई दिल्ली/नोएडा:
मीडिया संस्थानों में कर्मचारियों के हक की अनदेखी करना अब जनतंत्र TV के प्रबंधन को भारी पड़ सकता है।महिला पत्रकार एंकर मीनाक्षी सिसौदिया के साथ हुए दुर्व्यवहार और ‘फुल एंड फाइनल’ (F&F) सेटलमेंट में बरती गई भारी अनियमितताओं के मामले में अब श्रम विभाग (Labour Department) ने सक्रियता दिखाई है। विभाग ने इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लेते हुए जांच शुरू करेगी इसके साथ ही महिला एंकर से आज श्रम विभाग ने पूरे मामले की जानकारी ली हैं
श्रम कानूनों के उल्लंघन का घेरा
सूत्रों के अनुसार, श्रम विभाग उन बिंदुओं पर जांच केंद्रित करेगा जहाँ श्रम कानूनों (Labour Laws) की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गई हैं। जांच के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हो सकते हैं:
- पारदर्शिता का अभाव: बिना किसी ‘कैलकुलेशन शीट’ और ‘स्टैच्यूरी ब्रेकअप’ के भुगतान करना कानूनन गलत है।
- दस्तावेजी प्रक्रिया: एक्सपीरियंस लेटर और रिलीविंग लेटर न देना एक कर्मचारी के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
- मानसिक प्रताड़ना: डेढ़ महीने तक लिखित संवाद की अनदेखी और पुलिस हस्तक्षेप की नौबत आना संस्थान के वर्क-कल्चर पर बड़ा सवालिया निशान है।
खबर का असर: अब जवाब देना होगा मुश्किल
’मीडिया4समाचार’ पर खबर प्रमुखता से आने के बाद जिस तरह एडिटर इन चीफ जितेंद्र शर्मा और प्रबंधन ने आनन-फानन में बिना कागजी कार्रवाई के पैसे ट्रांसफर किए, उसे श्रम विभाग ‘साक्ष्यों से छेड़छाड़’ या ‘खानापूर्ति’ के तौर पर देख सकता है। कानूनन, किसी भी संस्थान को कर्मचारी के एग्जिट के समय पूरा ब्योरा देना अनिवार्य है, जो जनतंत्र TV ने नहीं किया।
“लाला कल्चर” पर गिरेगी गाज?
पत्रकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वह केवल पैसे नहीं, बल्कि अपना सम्मान और Documented Closure मांग रही हैं। श्रम विभाग के हस्तक्षेप के बाद अब संस्थान के पास चुप रहने या ‘सीन ज़ोन’ में डालने का विकल्प खत्म हो गया है। अब उन्हें विभाग के समक्ष यह साबित करना होगा कि उन्होंने प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया और क्यों एक महिला पत्रकार को अपने हक के लिए दफ्तर में पुलिस बुलानी पड़ी।
मीडिया जगत की नजरें अब जांच पर
यह मामला अब केवल एक पत्रकार बनाम संस्थान का नहीं रह गया है, बल्कि यह मीडिया इंडस्ट्री के उन हुक्मरानों के लिए एक चेतावनी है जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। श्रम विभाग की यह जांच तय करेगी कि क्या न्यूज़ रूम के अंदर भी संविधान और श्रम कानून लागू होते हैं या वहां सिर्फ ‘बॉस’ की मर्जी चलती है।




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