उन्नाव (उत्तर प्रदेश)।
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले से खाकी की कार्यशैली और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की भूमिका को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जिस मामले को स्थानीय पुलिस महज एक ‘सड़क दुर्घटना’ मानकर फाइल बंद करने की तैयारी में थी, उसे भारत समाचार के स्थानीय संवाददाता संकल्प दीक्षित की खोजी पत्रकारिता ने एक सुनियोजित ‘हत्या’ साबित कर दिया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि असली कातिल को सलाखों के पीछे भिजवाने में मदद करने वाले पत्रकार को ही अब पुलिस कानूनी नोटिस भेजकर परेशान कर रही है।

क्या है पूरा मामला?
जमीन के विवाद में चाचा का कत्ल
यह सनसनीखेज मामला अप्रैल महीने का है। फतेहपुर चौरासी थाना क्षेत्र के मलतापुर सुखाखेड़ा गांव के रहने वाले मुन्नू सिंह (50 वर्ष) बीते 25 अप्रैल की शाम को रोज की तरह अपने खेत की तरफ टहलने निकले थे। इसी दौरान उनके सगे भतीजे जितेंद्र सिंह ने कथित तौर पर उन पर ट्रैक्टर चढ़ा दिया। गंभीर रूप से घायल मुन्नू सिंह को पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सफीपुर और फिर जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
घटना के बाद पुलिस ने इसे एक सामान्य सड़क हादसा माना और इसी दिशा में कार्रवाई शुरू की। लेकिन गांव के लोगों के बीच इस मौत को लेकर गहरी सुगबुगाहट थी।
पत्रकार की पड़ताल ने पलटी पुलिस की ‘थ्योरी’
इस संदिग्ध मौत की खबर जब भारत समाचार के संवाददाता संकल्प दीक्षित तक पहुंची, तो उन्होंने पारंपरिक पुलिसिया बयानों पर भरोसा करने के बजाय जमीन पर जाकर मामले की तहकीकात शुरू की।
जमीनी सच्चाई: पत्रकार ने जब घटनास्थल का मुआयना किया और स्थानीय ग्रामीणों से बात की, तो कहानी कुछ और ही निकलकर सामने आई। मामला महज दुर्घटना का नहीं, बल्कि आपसी संपत्ति विवाद से जुड़ा हुआ था।
वो वीडियो जिसने खोल दिया राज: पड़ताल के दौरान पत्रकार के हाथ एक बेहद अहम वीडियो साक्ष्य लगा। इस वीडियो और ग्रामीणों के बयानों से साफ हो गया कि भतीजे जितेंद्र सिंह ने पहले चाचा मुन्नू सिंह को ट्रैक्टर से टक्कर मारी और फिर उनके साथ बेरहमी से मारपीट की, जिससे उनकी मौत हुई।
खबर के पुख्ता प्रमाणों के साथ प्रसारित होते ही प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। भारी दबाव के बीच पुलिस को अपनी शुरुआती थ्योरी बदलनी पड़ी। मामले की दोबारा गंभीरता से जांच हुई, मुकदमे में हत्या की धाराएं बढ़ाई गईं और मुख्य आरोपी भतीजे जितेंद्र सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
अब सच उजागर करने वाले पत्रकार पर ही ‘निशाना’
कायदे से जिस खोजी पत्रकारिता की सराहना होनी चाहिए थी, अब वही व्यवस्था के लिए चुभन बन गई है। आरोपी के जेल जाने के बाद स्थानीय पुलिस ने आत्ममंथन करने के बजाय अपनी खीझ पत्रकार पर निकालनी शुरू कर दी है। पुलिस ने पत्रकार संकल्प दीक्षित को नोटिस जारी कर यह मांग की है कि वे उस स्रोत (Source) का खुलासा करें, जहां से उन्हें वह वीडियो मिला था।
पत्रकारिता का बुनियादी नियम खतरे में:
दुनिया भर की पत्रकारिता का यह सार्वभौमिक नियम है कि पत्रकार अपने ‘स्रोतों की गोपनीयता’ को बनाए रखता है। अगर खोजी पत्रकार अपने मुखबिरों या सूत्रों के नाम उजागर करने लगेंगे, तो भविष्य में कोई भी नागरिक किसी भी जुर्म या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने खड़े किए गंभीर सवाल
पुलिसिया तंत्र पर अविश्वास क्यों?
जिस गांव के आम ग्रामीणों के पास वीडियो मौजूद था और वे इसे हत्या मान रहे थे, उसे पुलिस का खुफिया तंत्र, सर्विलांस और मुखबिर प्रणाली क्यों नहीं ढूंढ पाई? क्या पुलिस जानबूझकर मामले को दबाना चाहती थी?
जनता का पत्रकार पर भरोसा:
ग्रामीणों ने वीडियो पुलिस को सौंपने के बजाय एक पत्रकार को देना ज्यादा सुरक्षित समझा। यह साफ दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर पुलिस और जनता के बीच भरोसे का कितना बड़ा संकट है।
गलती सुधारने के बजाय दबाव की राजनीति:
अपनी शुरुआती लापरवाही पर पर्दा डालने के लिए क्या अब पुलिस खोजी पत्रकारों को डराने का प्रयास कर रही है? क्या सच दिखाने की कीमत अब कानूनी नोटिसों से चुकानी होगी?
निष्कर्ष:
उन्नाव की यह घटना इस बात का जीवंत उदाहरण है कि आज के दौर में निष्पक्ष पत्रकारिता करना कितना जोखिम भरा हो चुका है। अपराधियों से लड़ने के साथ-साथ अब पत्रकारों को उस सरकारी तंत्र से भी लड़ना पड़ रहा है, जिसका काम कानून की रक्षा करना है। सवाल बड़ा है—अगर सच दिखाने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया जाएगा, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कैसे सुरक्षित रहेगा?



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