भारतीय मीडिया और ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री से इस वक्त एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार चैनल के अलग-अलग रीजनल (क्षेत्रीय) चैनलों में कार्यरत करीब एक दर्जन एंकर पिछले पांच दिनों से अचानक ‘ऑफ एयर’ (स्क्रीन से दूर) कर दिए गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने मीडिया गलियारों में हड़कंप मचा दिया है और आज का दिन इस मामले में बेहद निर्णायक माना जा रहा है।
इथेनॉल और ‘भारत बंद’ के कंटेंट पर गिरी गाज
विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इन एंकर्स पर यह कार्रवाई उनके निजी सोशल मीडिया हैंडल्स, विशेषकर इंस्टाग्राम पर पोस्ट किए गए कुछ वीडियो और कंटेंट को लेकर की गई है। बताया जा रहा है कि इन एंकर्स ने इथेनॉल के खिलाफ वीडियो बनाए थे और बीते 15 जुलाई को बुलाए गए ‘भारत बंद’ को लेकर अपने प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट साझा किया था। मैनेजमेंट ने इसे अनुशासनहीनता और चैनल की नीतियों के खिलाफ मानते हुए यह सख्त कदम उठाया है।
मुंबई में आज होने वाली बैठक पर टिकीं नजरें
इस डांवाडोल और तनावपूर्ण स्थिति के बीच आज दोपहर मुंबई में एक बेहद अहम और आपातकालीन बैठक बुलाई गई है। सूत्रों का कहना है कि इस बैठक में प्रबंधन के शीर्ष अधिकारी शामिल हो रहे हैं, जहां इन सभी ‘ऑफ एयर’ चल रहे एंकरों के भविष्य और उनकी किस्मत का अंतिम फैसला किया जाएगा।
असंतोष के बीच बिहार चैनल से एक एंकर का इस्तीफा
चैनल के भीतर पैदा हुई इस अनिश्चितता और दबाव की स्थिति से क्षुब्ध होकर रीजनल चैनल से एक बड़ी खबर यह भी है कि बिहार चैनल में कार्यरत एक एंकर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि अंदरूनी कलह और फ्रीडम ऑफ स्पीच पर लगते अंकुश के विरोध में यह इस्तीफा हुआ है, जिसने प्रबंधन की चिंताएं और बढ़ा दी हैं।
आपातकाल के दौर की यादें हुईं ताजा
मौजूदा मीडिया परिदृश्य और मैनेजमेंट के इस रवैये ने देश में आपातकाल (Emergency) के उस दौर की यादें ताजा कर दी हैं, जब पत्रकारिता पर कड़ा पहरा था। उस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने मीडिया की रीढ़ पर तीखा तंज कसते हुए एक बेहद चर्चित टिप्पणी की थी कि— “उनसे केवल झुकने के लिए कहा गया था, लेकिन वे घुटनों के बल रेंगने लगे।”
आज मीडिया के मौजूदा हालातों को देखकर बुद्धिजीवियों का मानना है कि इतिहास खुद को और बदतर रूप में दोहरा रहा है। आज से पचास साल बाद जब कभी डोमिनिक लैपियर और लैरी कॉलिन्स जैसे इतिहासकार कोई नई ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ (Freedom at Midnight) लिखेंगे, तो वे शायद आडवाणी के उस कथन से भी दो हाथ आगे बढ़कर इस दौर की मीडिया के चरित्र का चित्रण कुछ इस तरह करेंगे— “उनसे रेंगने के लिए कहा गया था, मगर वे ज़मीन पर लोटने लगे!!”
फिलहाल, सबकी नजरें मुंबई में होने वाली इस हाई-प्रोफाइल बैठक पर टिकी हैं कि क्या इन एंकर्स की स्क्रीन पर वापसी होगी या मीडिया जगत को कोई और बड़ा संगठनात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।





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