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हिन्दी पत्रकारिता दिवस: ऐतिहासिक सफर,लोकतांत्रिक मूल्य और डिजिटल युग की चुनौतियाँ

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अमिता मिश्रा स्टेट हेड उत्तर प्रदेश-IBC 24 न्यूज चैनल 

हर साल 30 मई को पूरा देश ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ के रूप में मनाता है। यह दिन भारतीय जनमानस, भाषा और लोकतंत्र के लिए एक उत्सव की तरह है। आज से ठीक दो सौ साल पहले, सन् 1826 में इसी पावन तिथि को पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता (अब कोलकाता) से भारत के पहले हिन्दी साप्ताहिक पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का संपादन और प्रकाशन शुरू किया था। ‘उदन्त मार्तण्ड’ का शाब्दिक अर्थ है—’उगता हुआ सूर्य’। भले ही यह पत्र वित्तीय संकट के कारण डेढ़ साल से अधिक नहीं चल सका, लेकिन इसने भारतीय समाज में चेतना का जो सूरज उगाया, उसकी रोशनी आज भी देश को आलोकित कर रही है।
​वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब सूचनाओं का अंबार है और मीडिया का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है, तब हिन्दी पत्रकारिता के गौरवशाली अतीत को याद करना, उसके वर्तमान का मूल्यांकन करना और भविष्य की दिशा तय करना बेहद प्रासंगिक हो जाता है।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: एक ‘मिशन’ के रूप में शुरुआत
​हिन्दी पत्रकारिता का जन्म किसी व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि एक सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व के रूप में हुआ था। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में जब भारतीय समाज रूढ़ियों, अशिक्षा और गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब पत्रकारिता ही वह माध्यम बनी जिसने लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जगाया।
​स्वतंत्रता संग्राम और हिन्दी पत्रकारिता
​’उदन्त मार्तण्ड’ के बाद राजा राममोहन राय के ‘बंगदूत’, भारतेंदु हरिश्चंद्र के ‘कविवचनसुधा’ और ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ ने हिन्दी गद्य और पत्रकारिता को एक नई दिशा दी। बालकृष्ण भट्ट के ‘हिन्दी प्रदीप’ और प्रताप नारायण मिश्र के ‘ब्राह्मण’ ने समाज सुधार की अलख जगाई।
​आजादी के आंदोलन के दौरान पत्रकारिता पूरी तरह एक ‘मिशन’ बन चुकी थी। महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी और बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे महापुरुषों ने लेखनी को ही अपना हथियार बनाया।
​”प्रताप” और गणेश शंकर विद्यार्थी: कानपुर से निकलने वाले ‘प्रताप’ अखबार ने किसानों और मजदूरों की आवाज उठाई। गणेश शंकर विद्यार्थी ने निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। उनका जीवन इस बात का प्रतीक था कि पत्रकार का धर्म सिर्फ सत्ता की चाटुकारिता करना नहीं, बल्कि सत्य के साथ खड़े होना है।
​2. लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और सामाजिक सरोकार
​भारतीय संविधान में मीडिया को प्रत्यक्ष रूप से कोई विशेष अधिकार नहीं दिए गए हैं, लेकिन विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19-1-A) के तहत पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता ही वह शक्ति है जो बाकी के तीन स्तंभों को उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराती है।
हिन्दी पत्रकारिता की अद्वितीय शक्ति
​भारत में भाषाई विविधता के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता का क्षेत्र सबसे व्यापक है। इसका कारण इसकी सहजता, सरलता और जन-मन से जुड़ाव है।
​आम आदमी की आवाज: चाहे ग्रामीण भारत की समस्याएं हों, किसानों की बेबसी हो या फिर सुदूर इलाकों में स्वास्थ्य-शिक्षा की बदहाली; हिन्दी मीडिया ने हमेशा इन मुद्दों को मुख्यधारा में जगह दी है।
​सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भाषाई एकता: हिन्दी पत्रकारिता ने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक देश को एक भाषाई सूत्र में पिरोने का काम किया है। इसने अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती देते हुए आम बोलचाल की भाषा को सम्मान दिलाया।
​3. बाजारीकरण और आधुनिक चुनौतियाँ: ‘मिशन’ से ‘मार्केट’ तक
​आजादी के बाद के दशकों में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला। औद्योगिक घरानों के इस क्षेत्र में प्रवेश के साथ ही पत्रकारिता एक ‘मिशन’ से बदलकर एक ‘उद्योग’ या ‘मार्केट’ में तब्दील होने लगी। आज हिन्दी पत्रकारिता के सामने कई गंभीर संकट खड़े हैं:

प्रमुख चुनौतियाँ:
​टीआरपी और सनसनीखेज खबरें (Sensationalism): इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद ‘सबसे पहले’ खबर दिखाने की होड़ मच गई। इस अंधी दौड़ में खबरों की गहराई और सत्यता गायब हो गई। आज गंभीर विमर्श की जगह चिल्लाती हुई डिबेट्स (बहस) और सनसनीखेज सुर्खियों ने ले ली है।
फेक न्यूज और सोशल मीडिया का दुरुपयोग: आज व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बिना जांचे-परखे खबरें वायरल कर दी जाती हैं। मुख्यधारा की पत्रकारिता पर भी कई बार इन झूठी खबरों के जाल में फंसने का आरोप लगता है, जिससे मीडिया की विश्वसनीयता (Credibility) पर बट्टा लगा है।
​गोदी मीडिया बनाम पेड न्यूज (Paid News): पत्रकारिता का काम सत्ता से तीखे सवाल पूछना है, न कि उसकी कमियों पर पर्दा डालना। आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा वैचारिक रूप से बंट चुका है। निष्पक्षता की जगह किसी न किसी राजनैतिक दल या कॉरपोरेट घराने के प्रति झुकाव साफ नजर आता है।
पत्रकारों की सुरक्षा का संकट: आंचलिक या जमीनी स्तर पर काम करने वाले हिन्दी पत्रकारों को आज भी गंभीर खतरों का सामना करना पड़ता है। भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले पत्रकारों पर हमले और उनके दमन की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
4. डिजिटल क्रांति: हिन्दी पत्रकारिता का नया सवेरा
​चुनौतियों के इस दौर में डिजिटल पत्रकारिता (Digital Journalism) ने एक नई उम्मीद जगाई है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सस्ते डेटा ने पत्रकारिता का लोकतांत्रीकरण (Democratization) कर दिया है।

5. भविष्य की राह और सुधार के उपाय

​हिन्दी पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते वह अपनी जड़ों और नैतिक मूल्यों को न भूले। इसके सुधार के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने आवश्यक हैं:
​आत्म-नियमन (Self-Regulation): मीडिया को सनसनी फैलाने और फेक न्यूज से बचने के लिए कड़े आत्म-नियमन की आवश्यकता है। हर खबर को प्रसारित करने से पहले उसका ‘Fact-Check’ (तथ्य-जांच) अनिवार्य होना चाहिए।
​आंचलिक संवाददाताओं को संबल: ग्रामीण और छोटे कस्बों में काम करने वाले पत्रकारों को उचित मानदेय और सुरक्षा मिलनी चाहिए, क्योंकि असली पत्रकारिता वहीं से निकलती है।
​पाठकों और दर्शकों की जागरूकता: एक सभ्य समाज के निर्माण में पाठकों की भी भूमिका है। हमें सनसनीखेज और पीत पत्रकारिता (Yellow Journalism) को नकारना होगा और गंभीर, तथ्यात्मक पत्रकारिता को आर्थिक व नैतिक रूप से सपोर्ट करना होगा।
निष्कर्ष
​हिन्दी पत्रकारिता दिवस केवल गुजरे जमाने की यादों को ताजा करने का दिन नहीं है, बल्कि यह वर्तमान कमियों को सुधारने और भविष्य का रोडमैप तैयार करने का ‘संकल्प दिवस’ है। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने जिस ‘उदन्त मार्तण्ड’ की शुरुआत की थी, उसका उद्देश्य समाज के अंधकार को मिटाना था।
​आज के डिजिटल और कॉरपोरेट युग में भी पत्रकारिता का मूल मंत्र वही रहना चाहिए—”अंधकार से प्रकाश की ओर।” जब तक हिन्दी पत्रकारिता आम जनता के आंसू पोंछने, उनके अधिकारों की रक्षा करने और सत्ता को आईना दिखाने का काम निडरता से करती रहेगी, तब तक लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ अडिग और सम्मानित रहेगा।

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Author: media4samachar

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