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IAS संजय प्रसाद को हाईकोर्ट से दूसरी फटकार,आदेशों की परवाह नहीं’-क्यों न करें कार्रवाई ?

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लखनऊ/प्रयागराज।

उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के अपर मुख्य सचिव (गृह) और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय प्रसाद के आचरण पर बेहद तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में आपराधिक जांच (Criminal Investigation) की गिरती गुणवत्ता पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए साफ कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि इस वरिष्ठ अधिकारी को अदालत के आदेशों की कोई परवाह नहीं है।

​न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है और अगली सुनवाई के लिए 15 जुलाई की तारीख तय की है।

​’सेवा नियमों के तहत कार्रवाई क्यों न हो?’ – हाईकोर्ट का तीखा सवाल

​लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, खंडपीठ राज्य में आपराधिक मामलों की जांच के तौर-तरीकों और उसमें सुधार को लेकर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अपर मुख्य सचिव (गृह) के रवैये से नाराज अदालत ने अपने लिखित आदेश में कहा:

“प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारी को न्यायालय के आदेशों की भी परवाह नहीं है। अदालत यह पूछने पर मजबूर है कि आखिर क्यों न ऐसे अधिकारी के खिलाफ प्रचलित सेवा नियमों (Service Rules) के तहत राज्य सरकार अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करे?”

 

​अदालत की इस टिप्पणी ने सीधे तौर पर राज्य सरकार को बैकफुट पर ला दिया है, क्योंकि गृह विभाग राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिसिंग का सबसे शीर्ष विंग है।

​लगातार दूसरी बार निशाने पर आए ACS संजय प्रसाद

​यह कोई पहला मौका नहीं है जब आईएएस संजय प्रसाद को हाईकोर्ट की नाराजगी झेलनी पड़ी हो। इससे पहले भी एक अन्य मामले में कोर्ट उन पर गंभीर सवाल उठा चुका है।

  • एकल पीठ की सख्त टिप्पणी: इससे पहले न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने पुलिस सुधारों से जुड़े एक मामले में संजय प्रसाद के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताई थी।
  • DoPT और पीएमओ को हस्तक्षेप का सुझाव: एकल पीठ ने अपने आदेश में यहाँ तक कह दिया था कि इस अधिकारी के आचरण की समीक्षा केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) और प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली नियुक्ति समिति (ACC) द्वारा की जानी चाहिए।
  • भविष्य की तैनाती पर सवाल: कोर्ट ने सुझाव दिया था कि भविष्य में संजय प्रसाद को कोई भी महत्वपूर्ण या संवेदनशील जिम्मेदारी सौंपने से पहले उनके ट्रैक रिकॉर्ड और उपयुक्तता की जांच की जानी चाहिए।

​प्रशासनिक हलकों में बढ़ी बेचैनी, सरकार के रुख पर टिकी नजरें

​हाईकोर्ट की दो अलग-अलग पीठों द्वारा एक ही अधिकारी के खिलाफ इतनी सख्त टिप्पणियां किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और अधिकारियों की जवाबदेही पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञ अब सरकार की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं।

​हालांकि, तकनीकी रूप से अभी तक हाईकोर्ट ने संजय प्रसाद के खिलाफ सीधे तौर पर किसी दंडात्मक (Punitive) कार्रवाई का आदेश नहीं दिया है, बल्कि सरकार से सवाल किया है। राज्य सरकार की ओर से भी अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

​अब आगे क्या?

​कानूनी जानकारों का मानना है कि 15 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के लिए बेहद अहम होगी। कोर्ट की नाराजगी को देखते हुए सरकार के पास दो ही रास्ते हैं— या तो वह कोर्ट में अधिकारी के पक्ष में ठोस दलीलें और सुधारात्मक कदमों का हलफनामा पेश करे, या फिर कोर्ट के गुस्से को शांत करने के लिए सुनवाई से पहले ही संजय प्रसाद को गृह विभाग के पद से हटाकर किसी अन्य विभाग में भेज दे। फिलहाल, सबकी निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

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Author: media4samachar

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