लखनऊ/नोएडा। उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPSIDA) में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ Media4samachar की खोजी पत्रकारिता का एक बार फिर बड़ा और निर्णायक असर देखने को मिला है। यूपीसीडा के विवादित और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे वरिष्ठ परियोजना अधिकारी ब्रजेश कश्यप का आनन-फानन में नोएडा तबादला कर दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद से विभाग के भ्रष्ट गठजोड़ और अधिकारी वर्ग में हड़कंप का माहौल है।
खबर छपते ही शासन स्तर पर मची खलबली
गौरतलब है कि Media4samachar ने ब्रजेश कश्यप के कार्यकाल के दौरान हुई वित्तीय गड़बड़ियों, फाइलों को दबाने और परेशान करने के खेल को प्रमुखता से उजागर किया था। साक्ष्यों के साथ प्रकाशित की गई इस खबर के बाद शासन स्तर और औद्योगिक विकास विभाग के उच्च अधिकारियों ने मामले का कड़ा संज्ञान लिया। सूत्रों के मुताबिक, खबर के सोशल मीडिया और प्रशासनिक गलियारों में वायरल होते ही ऊपर से कार्रवाई के कड़े निर्देश जारी कर दिए गए थे।
लंबे समय से मिल रही थीं शिकायतें
ब्रजेश कश्यप पर विभागीय नियमों को ताक पर रखकर काम करने और अपने चहेतों को फायदा पहुँचाने के कई गंभीर आरोप थे। स्थानीय स्तर पर लगातार विरोध के बावजूद प्रशासनिक सांठगांठ के चलते उन पर कार्रवाई नहीं हो पा रही थी। लेकिन Media4samachar की बेबाक रिपोर्टिंग ने पूरे मामले की परतें खोलकर रख दीं, जिससे बैकफुट पर आए विभाग को अंततः तबादले का कदम उठाना ही पड़ा।
भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ या सिर्फ लीपापोती?
इस तबादले को जहां एक तरफ मीडिया की ताकत और असरदार पत्रकारिता की जीत के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि क्या यह ट्रांसफर सिर्फ मामले को शांत करने की एक कोशिश है?
जानकारों का मानना है कि इतने गंभीर आरोपों के बाद सिर्फ तबादला काफी नहीं है, बल्कि कश्यप के कार्यकाल के दौरान हुए सभी फैसलों की एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार की जड़ तक पहुँचा जा सके।
Media4samachar की प्रतिबद्धता
Media4samachar शुरुआत से ही प्रशासनिक मनमानी, भ्रष्टाचार और जनता से जुड़े मुद्दों को बिना किसी डर के उठाता रहा है। ब्रजेश कश्यप का तबादला यह साबित करता है कि जब पत्रकारिता पूरी ईमानदारी और साक्ष्यों के साथ की जाती है, तो व्यवस्था को झुकना ही पड़ता है। हमारा यह अभियान आगे भी इसी तरह जारी रहेगा।
एक भ्रष्ट अफसर एक कुर्सी से दूसरी लेकिन और बड़ी मलाईदार कुर्सी पर चला जाए, तो यह सिस्टम से लड़ने वालों की जीत नहीं होती। जीत तो तब होगी जब सिस्टम में ऐसे अफ़सर शासन के कोप भाजन बनते। शासन तो ऐसे अफसरों को वर्षों तक बचाता रहा है, उसी के ख़िलाफ़ दर्ज शिकायतें उसी भ्रष्ट अफ़सर से निस्तारित करवाता रहा है, और अंत में पीड़ित आदमी को अदालत, आरटीआई, जनसुनवाई, मीडिया और सोशल मीडिया के चक्रव्यूह में फँसा देता है।
एक और दिलचस्प बात यह भी हुई कि ट्रांसफर की इस लंबी लिस्ट में 17 अफसरों के तबादले उसी के अगले ही दिन निरस्त हो गए। औद्योगिक विकास विभाग में जिस तरह तबादलों पर घमासान मचा, 24 घंटे में आदेश पलटे, 17 अफसरों के ट्रांसफर निरस्त हुए, NCR पोस्टिंग को लेकर खींचतान की खबरें आईं,





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