कोलकाता/नई दिल्ली:
पश्चिम बंगाल के चुनावी दंगल को कवर कर लौटीं देश की जानी-मानी पत्रकार और इंडिया टुडे की मैनेजिंग एडिटर प्रीति चौधरी ने राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण लेख साझा किया है। चार चुनावों के कवरेज के अपने लंबे अनुभव को समेटते हुए उन्होंने बताया कि महिलाओं को लेकर बंगाल की सोच उत्तर भारत के कई हिस्सों से कहीं ज्यादा प्रगतिशील और सहज है।
भीड़ में बदसलूकी नहीं, सम्मान मिलता है
प्रीति चौधरी ने चुनावी रैलियों के जमीनी हकीकत का जिक्र करते हुए कहा कि एक महिला पत्रकार के लिए दूसरे राज्यों में भीड़ अक्सर एक जोखिम की तरह होती है। अफरा-तफरी के नाम पर होने वाली बदसलूकी और अनचाहे स्पर्श अन्य राज्यों में आम हैं, लेकिन बंगाल का अनुभव इससे बिल्कुल जुदा है।
उन्होंने लिखा, “बंगाल में भीड़ उतनी ही घनी होती है, लेकिन वहाँ लोग रास्ता देते हैं। अगर गलती से टकराव हो भी जाए तो उसमें हक जताने का भाव नहीं, बल्कि झिझक होती है। यह दिखावटी शिष्टता नहीं, बल्कि सच्ची बराबरी का एहसास है।”
‘शक्ति’ की सांस्कृतिक जड़ें
लेख के मुताबिक, बंगाल में महिलाओं को एक स्वतंत्र इंसान के रूप में देखने की समझ बहुत गहरी है। प्रीति इसे वहां की ‘शक्ति’ की सांस्कृतिक भावना से जोड़कर देखती हैं। उनके अनुसार, यही कारण है कि वहां महिला नेताओं के ‘आक्रामक’ और ‘बेबाक’ अंदाज़ को ‘मर्दाना’ कहकर उनकी आलोचना नहीं की जाती, बल्कि उसे सहजता से स्वीकार किया जाता है।
सशक्तिकरण यहाँ जीवन का हिस्सा है
पत्रकारिता के अपने सफर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जो चीज़ बाहरी दुनिया के लिए ‘महिला सशक्तिकरण’ का बड़ा नारा हो सकती है, वह बंगाल की सामान्य संस्कृति का हिस्सा है।
मुख्य अंश:
- सुरक्षा: चुनावी रैलियों के भारी माहौल में भी महिला पत्रकारों के लिए सुरक्षित वातावरण।
- नेतृत्व: महिला नेताओं की बेबाकी और नेतृत्व क्षमता की व्यापक स्वीकार्यता।
- तुलना: उत्तर भारत के कई क्षेत्रों की तुलना में महिलाओं के प्रति अधिक सम्मानजनक नजरिया।
अंत में उन्होंने एक उम्मीद जताई कि चाहे सरकारें किसी भी दल की आएं या जाएं, लेकिन महिलाओं को देखने और समझने का यह मानवीय और सम्मानजनक तरीका हमेशा बना रहना चाहिए।




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