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सुप्रीम कोर्ट: वैवाहिक मामलों में ‘राइट टू प्राइवेसी’ और अफेयर पर बड़ा फैसला

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वरिष्ठ अधिवक्ता.नीलम पाठक-सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (लीगल एडिटर Media4samachar)

सुप्रीम कोर्ट ने राइट-टू प्राइवेसी पर बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले निजता के अधिकार का उपयोग शादी के बाद अफेयर के संबंध को छिपाने के लिए नहीं कर सकते हैं।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला निजता का अधिकार इतना व्यापक नहीं है कि उसका इस्तेमाल पति या पत्नी से अफेयर के सबूत छिपाने के लिए किया जाए। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया तलाक के मामलों में यदि व्यभिचार साबित करने के लिए मोबाइल कॉल रिकॉर्ड या होटल में ठहरने का रिकॉर्ड जरूर हो, तो सिर्फ निजता का हवाला देकर इन दस्तावेजों को अदालत में पेश होने से नहीं रोका जा सकता है।

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा, दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया और पति की अपील को खारिज कर दिया। पति ने तर्क दिया था कि उसके रिकॉर्ड और होटल में ठहरने की जानकारी अदालत में मंगाना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

हाई कोर्ट के फैसले पर ‘सुप्रीम’ मुहर

दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा था कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है। अदालत ने कहा था सार्वजनिक हित और न्याय सुनिश्चित करने के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने था कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट में बेवफाई को तलाक का वैध आधार माना गया है। इसलिए, यह बिल्कुल भी जनहित में नहीं होगा कि अदालत निजता के अधिकार के आधार पर ऐसे विवाहित पुरुष की मदद करे, जिस पर शादीशुदा होने के बावजूद शादी के बाहर यौन संबंध बनाने का आरोप हो।

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराते हुए यह बात कही थी। जिसमें उसके होटल में ठहरने के रिजर्वेशन की जानकारी और कॉल डिटेल रिकॉर्ड देने का निर्देश दिया गया था।

क्या था मामला?

मामले में दंपति की शादी 1998 में हुई थी और 2000 में उनकी एक बेटी पैदा हुई। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके पति का दूसरी महिला के साथ शादी के बाद भी संबंध था और वह उसके साथ जयपुर के एक होटल में रुका था।

इन आरोपों के बाद पत्नी ने तलाक की याचिका दायर करते हुए पति के होटल बुकिंग रिकॉर्ड और मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड अदालत से मंगाने की मांग की। परिवार न्यायालय ने यह मांग स्वीकार कर ली, जिसे बाद में दिल्ली हाई कोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।

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Author: media4samachar

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