प्रयागराज/नोएडा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के वरिष्ठ पत्रकार पंकज पाराशर को बड़ी राहत देते हुए उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली है। जमानत आदेश पारित करते हुए अदालत ने मामले के तथ्यों और पुलिस की कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।
पुलिस की भूमिका पर अदालत की तल्ख टिप्पणी
न्यायामूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की पीठ ने २२ मई २०२६ को पारित अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड को देखने से प्रथम दृष्टया यह साफ होता है कि पंकज पाराशर के खिलाफ दर्ज अधिकांश मामले स्थानीय पुलिस के कहने पर दर्ज किए गए हैं। अदालत ने कहा कि पत्रकार के वकील के इस तर्क को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि पुलिस की कार्यप्रणाली और उनकी अनियमितताओं को उजागर करने के कारण ही पंकज पाराशर को झूठे मामलों में फंसाया गया हो।
गबन के आरोपों पर कोई ठोस शिकायत नहीं
अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि जिस सोसाइटी में कथित अनियमितताओं और गबन को लेकर आरोप लगाए गए हैं, उसके संबंध में अब तक रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज के समक्ष पंकज पाराशर या अन्य पदाधिकारियों के खिलाफ कोई आधिकारिक शिकायत या कार्रवाई शुरू नहीं की गई है।
जांच पूरी, अब हिरासत की जरूरत नहीं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि:
- इस मामले में ९ मार्च २०२६ को आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल किया जा चुका है।
- संबंधित अदालत ने १० मार्च २०२६ को इसका संज्ञान भी ले लिया है।
- चूंकि जांच पूरी हो चुकी है, इसलिए आरोपी से अब हिरासत में पूछताछ करने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है।
अदालत ने मामले के गुण-दोष पर बिना कोई अंतिम टिप्पणी किए, जांच पूरी होने और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत का मजबूत आधार माना।
इन शर्तों पर मिली रिहाई
हाईकोर्ट ने पंकज पाराशर को एक निजी मुचलके और दो जमानतदार प्रस्तुत करने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने उन पर कुछ कड़े प्रतिबंध भी लगाए हैं:
- वह मामले से जुड़े साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करेंगे।
- किसी भी प्रकार की आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे।
- गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेंगे।
- ट्रायल (मुकदमे) के दौरान नियमित रूप से अदालत में उपस्थित रहेंगे।





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