भारतीय लोकतंत्र के चारों स्तंभों को पैसे और रसूख के दम पर बंधक बनाने वाले एक ऐसे कॉरपोरेट सिंडिकेट का पर्दाफाश हुआ है, जिसने देश की सुरक्षा और आर्थिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है।मिले सीक्रेट दस्तावेजों और आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी द्वारा सार्वजनिक किए गए सबूतों से यह साफ हो गया है कि देश का कथित सबसे बड़ा हवाला ऑपरेटर विवेक नागपाल सिर्फ एक कारोबारी नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष गलियारों को नियंत्रित करने वाला एक खतरनाक मास्टरमाइंड है।

दस्तावेजों के अनुसार, अरबों-खरबों के घपले-घोटालों और देश विरोधी गतिविधियों में नाम आने के बाद भी पुलिस, सीबीआई या ईडी का विवेक नागपाल पर हाथ न डाल पाना यह साबित करता है कि उसने देश के शासन, प्रशासन, राजनेताओं, नौकरशाहों, जजों और यहाँ तक कि मीडिया दिग्गजों को भी अपने वित्तीय साम्राज्य के टुकड़ों पर पाल रखा है।
प्रणब मुखर्जी की सचिव ओमिता पॉल से ‘कनेक्शन’: सत्ता के केंद्र में था रसूख
दस्तावेजों में जो सबसे चौंकाने वाला और गंभीर खुलासा हुआ है, वह विवेक नागपाल के सीधे राजनीतिक संबंधों को लेकर है। नागपाल के तार कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, दोनों ही प्रमुख दलों के शीर्ष नेताओं से जुड़े रहे हैं:
- ओमिता पॉल का कथित ‘बैगमैन’: जब प्रणब मुखर्जी देश के वित्त मंत्री थे, तब उनकी सबसे शक्तिशाली सचिव ओमिता पॉल के साथ विवेक नागपाल के बेहद करीबी और संदेहास्पद रिश्ते थे। लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में नागपाल को ओमिता पॉल का ‘बैगमैन’ (अवैध वित्तीय लेन-देन संभालने वाला) कहा जाता था।
- सरकारी बैंकों में ‘पद’ बेचने का धंधा: इस रसूख का फायदा उठाकर नागपाल ने सरकारी बैंकों में डायरेक्टर के पद दिलवाने और वरिष्ठ बैंक अधिकारियों को शीर्ष व मलाईदार पोस्टिंग दिलाने के नाम पर एक बड़ा रैकेट चलाया, जिसके जरिए उसने अफसरों से करोड़ों रुपये वसूले।
- के.के. पॉल और सुधांशु मित्तल का सुरक्षा कवच: नागपाल को बचाने के लिए पर्दे के पीछे से ओमिता पॉल के पति के.के. पॉल (दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर और उत्तराखंड के पूर्व राज्यपाल) का हाथ हमेशा उसके सिर पर रहा। इसके अलावा, भाजपा के कद्दावर नेता और लायजनर सुधांशु मित्तल के साथ भी नागपाल की गहरी नजदीकियां थीं। इसी ‘क्रॉस-पार्टी’ रसूख के कारण सरकार चाहे किसी की भी रही हो, नागपाल हमेशा अछूता रहा।
ललित मोदी के परिवार से ₹80 करोड़ की रंगदारी और फोन टैपिंग का गंदा खेल
इस सिंडिकेट का सबसे सनसनीखेज पहलू तब सामने आया जब ललित मोदी ने खुद नागपाल के खिलाफ मोर्चा खोला। मोदी के अनुसार, नागपाल की दबंगई इस कदर बढ़ चुकी थी कि उसने ललित मोदी के पिता और जाने-माने उद्योगपति के.के. मोदी को बुलाकर ₹80 करोड़ की मोटी रकम मांगी थी। पैसे देने से इनकार करने पर नागपाल ने तत्कालीन वित्त मंत्रालय और ओमिता पॉल के प्रभाव का इस्तेमाल कर ललित मोदी का पासपोर्ट जब्त करा देने और देश से बाहर न जाने देने की सीधी धमकी दी थी।
इसी प्रताड़ना से तंग आकर ललित मोदी ने ब्रिटेन में शरण ली और देश के एक कुख्यात निजी जासूस अनुराग सिंह की सेवाएं लीं। मोदी ने विवेक नागपाल के फोन टेप करवाए, उसके पर्सनल कंप्यूटर की हार्ड डिस्क हैक कराई और वे सारे सीक्रेट दस्तावेज हासिल कर लिए जिन्हें बाद में उन्होंने ऑनलाइन लीक कर देश की राजनीति में भूचाल ला दिया।
नेताओं की जासूसी: अमर सिंह से अरुण जेटली तक के फोन कराए टेप
विवेक नागपाल का नाम देश के सबसे हाई-प्रोफाइल फोन टैपिंग कांडों से जुड़ा है। नागपाल अपनी सुरक्षा और ब्लैकमेलिंग के लिए बड़े राजनेताओं की जासूसी कराता था:
- अमर सिंह फोन टैपिंग: इस मामले में जब दिल्ली पुलिस ने जासूस अनुराग सिंह को गिरफ्तार किया, तो उसने साफ कुबूल किया था कि उसे यह काम विवेक नागपाल ने सौंपा था और पूरी फंडिंग नागपाल की तरफ से हुई थी। लेकिन रसूख के चलते पुलिस ने नागपाल पर हाथ तक नहीं डाला।
- अरुण जेटली जासूसी कांड: तत्कालीन दिग्गज भाजपा नेता अरुण जेटली के फोन टैपिंग मामले में भी इसी अनुराग सिंह की गिरफ्तारी हुई और यहाँ भी मास्टरमाइंड के तौर पर नागपाल का नाम आया, लेकिन पुलिस ने उससे पूछताछ करने की हिम्मत तक नहीं दिखाई।
- प्रतिद्वंद्वियों को ब्लैकमेल करना: हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट (HSRP) के कारोबार में नागपाल के व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वी नितिन शाह ने आरोप लगाया कि नागपाल ने उनके फोन टेप कराकर बातचीत की ट्रांसक्रिप्ट उनके सामने रख दी थी और धमकी देकर उनकी कंपनी को औने-पौने दाम में खरीदने की कोशिश की थी। के.के. पाल के दबाव में यह पूरा मामला रफा-दफा कर दिया गया था।
35 कंपनियां, पाक-स्विस बैंक खाते और ₹30,000 करोड़ का साम्राज्य
वित्तीय अपराधों की दुनिया में विवेक नागपाल का रिकॉर्ड किसी अंतरराष्ट्रीय डॉन से कम नहीं है:
- केतन पारेख शेयर घोटाला: देश के बहुचर्चित केतन पारेख स्टॉक घोटाले की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की रिपोर्ट में विवेक नागपाल को पारेख के बराबर ही आर्थिक अपराध का दोषी पाया गया था।
- पद्मिनी टेक्नोलॉजीज का खेल: नागपाल की कंपनी ‘पद्मिनी टेक्नोलॉजीज’ के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जांच शुरू की थी। इस कंपनी ने करोड़ों के टर्नओवर के बावजूद अपने आईटी रिटर्न में अपनी आमदनी ‘शून्य’ दिखाई थी।
- अंतरराष्ट्रीय हवाला नेटवर्क: साल 2007 में जब कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय में ‘सीरियल फ्रॉड डिवीजन’ बना, तो सबसे पहला मामला नागपाल के खिलाफ ही दर्ज हुआ था। नागपाल देश-विदेश में करीब 35 बेनामी कंपनियां और सैकड़ों बैंक खाते संचालित करता है, जिनमें पाकिस्तान के हबीब बैंक से लेकर स्विट्जरलैंड के फर्स्ट ग्लोबल बैंक तक के खाते शामिल हैं। वह हर साल करीब ₹150 करोड़ से ज्यादा का अवैध हवाला कारोबार करता रहा है और देश के ₹30,000 करोड़ के हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट बाजार के आधे से ज्यादा हिस्से पर एकाधिकार जमाए बैठा है।
शर्मनाक: नागपाल के ‘टुकड़ों’ पर पलते हैं देश के दिग्गज पत्रकार!
इस पूरी कहानी का सबसे काला और वीभत्स चेहरा भारतीय मीडिया का है। देश की जनता को सच दिखाने का दावा करने वाले दर्जनों तथाकथित मीडिया दिग्गज और एंकर विवेक नागपाल के इशारे पर नाचते थे।
ललित मोदी द्वारा लीक की गई ‘गिफ्ट लिस्ट’ में उन पत्रकारों के नाम दर्ज हैं जिन्हें नागपाल समय-समय पर सूट लेंथ, बेड कवर, महंगे तोहफे और वित्तीय लाभ (रिश्वत) भेजकर ‘ओबलाइज’ करता था। इन गिफ्ट्स को लेने के बाद इन पत्रकारों का ईमान इस कदर मर चुका था कि वे नागपाल के इशारे पर उसके व्यावसायिक और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मनगढ़ंत खबरें छापते थे और नागपाल के घोटालों पर पूरी तरह चुप्पी साध लेते थे।
संपादकीय टिप्पणी: कब जागेगी देश की अदालतें और एजेंसियां?
यह रिपोर्ट केवल एक व्यक्ति के अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि कैसे एक क्रिमिनल माइंडसेट वाला हवाला कारोबारी अरबों रुपये के काले धन के बूते पूरे देश के सिस्टम को पंगु बना सकता है। ललित मोदी द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों के बाद अब यह सवाल सीधे तौर पर देश की सर्वोच्च अदालतों और जांच एजेंसियों के सामने खड़ा है—क्या कानून की नजर में सब बराबर हैं, या विवेक नागपाल जैसे सफेदपोश अपराधी हमेशा देश और संविधान से ऊपर बने रहेंगे?





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